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राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ 3 / Raja Vikramaditya Ki Kahaniya 3

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सिंहासन बत्तीसी Stories of Raja Vikramaditya  तीसरी पुतली चन्द्रकला ने अपनी कहानी सुनाई - एक बार राजा विक्रमादित्य अपने नदी के किनारे बने महल में संगीत सुन रहे थे । वे संगीत में डुब कर उसका आनंद लें रहे थे । उसी समय एक व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चे के साथ नदी में छलांग लगा देता है । जब वे डूबने लगे तो उन्हें अपने किये पर पछतावा होने लगा और वे चिल्लाने लगते है - बचाओ बचाओ । उसी समय राजा के आदमी वहां पहुचते है और यह खबर राजा विक्रमादित्य को देते हैं । राजा वहां पहुंचते ही नदी में छलांग लगा देता है । जल में आगे बढ़कर उन्होंने स्त्री और बच्चे का हाथ पकड़ लिया । तभी वह आदमी भी आकर राजा से लिपट गया । राजा घबरा गए क्योंकि उसके साथ वह भी डूबने लगे ।  उसी समय राजा को अपने दोनों वीरों की याद आई जो उन्हें देवी से मिला था । वे दोनों वीर तत्काल वहां पहुंचे और राजा सहित तीनों को बचाया ।  वह आदमी राजा के पैरों में गिर पड़ा और कहने लगा आपने हमारी जान बचाई आप भगवान है । राजा विक्रमादित्य बोले - बचाने वाला तो ईश्वर है । उस आदमी को बहुत सारा धन देकर विदा किया ।  तीसरी पुतली चन्द्रकला राजा भोज से बोली - हे

राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ 2 / Raja Vikramaditya Ki Kahaniya 2

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सिंहासन बत्तीसी सिंहासन बत्तीसी की कहानी दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी - एक बार राजा विक्रमादित्य की इच्छा योग साधना की हुई । अपना राजपाट वे अपने भ्राता भर्तृहरि को सौंप कर जंगल चले गए ।  उसी जंगल में एक ब्राह्मण भी तप कर रहा था । एक बार देवताओं ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया , जिसे खाकर मनुष्य अमर हो जाता है। ब्राह्मण ने वह फल अपनी पत्नी को दे दिया । उसकी पत्नी ने कहा यह फल मेरे किस काम का इसे राजा को दे दीजिये और कुछ धन ले आइये । ब्राह्मण ने ऐसा ही किया और वह फल राजा को दे दिया । राजा भर्तृहरि अपनी रानी से बहुत प्रेम करते थे अतः उन्होंने वह फल अपनी रानी को दे दिया । रानी का संबध नगर के कोतवाल से था उसने कोतवाल को दे दिया । वह कोतवाल एक वेश्या के पास जाता था अतः कोतवाल ने वह फल वेश्या को दे दिया । वेश्या ने सोचा कि मैं अमर होके क्या हमेशा पाप ही करतीं रहूंगी अतः यह फल राजा को देना बेहतर है । उसने वह फल राजा को जाकर दे दिया । राजा भर्तृहरि वह फल देखकर चकित रह गए । उन्हें सब भेद पता चल गया । वे अपनी प्रिय रानी का विश्वासघात सह न सके और सबकुछ छोडक़र तपस्वी बन गए । राजा इन्द्र को जब पता

राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ / Raja Vikramaditya Ki Kahaniya

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सिंहासन बत्तीसी      Stories of Raja Vikramaditya पहली पुतली रत्नमंजरी की कहानी - अंबावती राज्य में गंधर्वसेन नामक राजा राज्य करता था । उसके चार रानियां थी एक ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र । ब्राह्मण रानी से उसे एक पुत्र ब्रह्मणीत था । क्षत्रिय रानी से शंख , विक्रमादित्य और भर्तृहरि नामक तीन पुत्र हुए । वैश्य से एक पुत्र हुआ जिसका नाम चन्द्र रखा गया और शुद्र से धनवंतरि नामक पुत्र हुआ । पहले पुत्र ने अपने पिता गंधर्वसेन को मारकर राज्य हडप लिया और अपनी राजधानी उज्जैनी को बनाया परंतु गद्दी में बैठते ही उसकी मृत्यु हो गई तत्पश्चात शंख गद्दी पर बैठा । कुछ समय पश्चात विक्रमादित्य ने शंख को मरवा डाला और खुद गद्दी पर बैठा ।  एक दिन राजा विक्रमादित्य शिकार खेलने गया और बहुत आगे बढ़ गया । घने जंगल में उसने चारों ओर देखा कहीं कोई नजर नहीं आया । राजा विक्रमादित्य पेड़ पर चढ़ गया और चारों तरफ देखा । उसे एक बहुत बड़ा नगर दिखाई पड़ा । अगले दिन राजा अपने नगर लौटा और वहां उसने अपने दरबारियों को उस नगर के बारे में बताया तो पता चला कि वहां बाहुबल नाम का राजा राज्य करता है, आपके पिता राजा गंधर्वसेन

चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य का जीवन / Chakarvarti Raja Vikramaditya ka Jivan

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विक्रमादित्य परमार वंश के उज्जयिनी के राजा थे, जो अपने ज्ञान , वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे । 'विक्रमादित्य' की उपाधि बाद में बहुत से राजाओ ने ली थी जिसमें से प्रमुख थे - चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य । विक्रमादित्य नाम विक्रम और आदित्य से मिलकर बना है , जिसका अर्थ होता है 'पराक्रम का सूर्य' ।        Chakarvarti Raja Vikramaditya Life story राजा विक्रमादित्य का जन्म और जीवन ( Life history of Raja vikramaditya) राजा विक्रमादित्य के जन्म को लेकर विभिन्न मान्यताएं हैं परंतु फिर भी माना जाता है कि उनका जन्म 102 ई. पूर्व से आसपास हुआ । ऐसा माना जाता है कि विक्रमादित्य का जन्म भगवान भोलेनाथ के वरदान से हुआ था । भोलेनाथ ने उनका नामकरण जन्म से पूर्व ही कर दिया था , ऐसी मान्यता है । राजा विक्रमादित्य ने आजीवन अन्याय का पक्ष नहीं लिया । पिता द्वारा युवराज घोषित कर दिए जाने पर भी उन्होंने इसलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि इस पद पर उनके ज्येष्ठ भ्राता भर्तृहरि का अधिकार समझते थे । इसे उनके पिता ने अपनी अवज्ञा समझा और वे क्रोधित हो उठे परंतु न्यायप्रिय व

चक्रवर्ती राजा भोज परमार / Chakarvarti Raja Bhoj Parmar

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राजा भोज परमार वंश के नवें राजा थे । परमार वंशीय राजाओं ने मालवा की राजधानी धारानगरी (धार) से आठवीं शताब्दी से लेकर चौदहवीं शताब्दी के पूर्वाध तक राज्य किया । भोज ने कई प्रसिद्ध युद्ध किए और अपनी प्रतिष्ठा स्थापित की।  यद्यपि भोज का अधिकतर समय युद्ध में ही बीता तथापि उन्होंने अपने राज्य की उन्नति में किसी प्रकार की कोई गलती नहीं की । उन्होंने मालवा के बहुत से गावों में मंदिरों का निर्माण करवाया । ऐसा माना जाता है कि भोपाल शहर को राजा भोज ने ही बसाया था जिसका नाम पहले भोजपाल नगर था ।             Chakarvarti Raja Bhoj Parmar 15 वर्ष की अल्पायु में सिंहासन पर बैठने वाले राजा भोज चारों ओर से शत्रुओं से घिरे हुए थे । उत्तर में तुर्कों , दक्षिण मे विक्रम चालुक्य , पूर्व में युवराज कलचुरी तथा पश्चिम में भीम चालुक्य से उन्हें लोहा लेना पड़ा । उन्होंने सबसे लडाई जीती और अपने साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया । तेलंगान के तेलप और तिरहुत को हराने के बाद एक कहावत राजा भोज के बारे में बहुत मशहूर हुई - "कहां राजा भोज कहां गंगू तेली "  पढ़े :-  कहां राजा भोज कहां गंगू तेली राजा भोज महान चक्रवर्ती स

मगध सम्राट बिम्बिसार की जीवनी / Magdha samrat Bimbisar ki Jivani

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            Magdha king Bimbisar biography          मगध के इतिहास का वास्तविक आरंभ हर्यक वंश के साथ होता है । इस वंश से पहले के वंशों का उल्लेख महाभारत और पुराणों में मिलता है, जिसके अनुसार मगध के प्राथमिक राजवंश की स्थापना वृहद्रथ ने की जो जरासंघ का पिता और वसु का पुत्र था ।  बिम्बिसार का जन्म 558 ईसा पूर्व के लगभग हुआ । बिम्बिसार की राजधानी गिरिवज्र ( राजगीर ) थी । वे पंद्रह वर्ष की आयु में ही राजा बने । प्रसेनजित की बहन और कोसल की राजकुमारी महाकौशला इनकी महारानी और अजातशत्रु की माता थी। चेल्लना , खेमा , सीलव और जयसेना नामक अन्य पत्नियां थी । विख्यात नृत्यांगना आम्रपाली से इन्हें एक पुत्र था । बिम्बिसार बुद्ध के उपदेशों से बहुत प्रभावित थे । महावग्ग के अनुसार बिम्बिसार की 500 रानियां थी  बिम्बिसार हर्यक वंश का संस्थापक था । वह एक महत्वकांक्षी राजा था । उसने वैवाहिक संबंधों , संधियों और विजयों के द्वारा मगध की प्रतिष्ठा बढ़ाई । तिब्बत साहित्य में उसका नाम महापद्य दिया गया है । बिम्बिसार का दूसरा नाम श्रेणिक था । वह महात्मा बुद्ध का समकालीन था ।  पुराणों के अनुसार उसने 28 वर्षों तक शास

जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी / Jain Dharma ke 24ve Tirthakar Mahavir swami

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महावीर स्वामी जैन धर्म के 24 वें और अंतिम तीर्थंकर माने जाते हैं । उनका जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत था । वे अहिंसा के सच्चे पुजारी थे । हिंसा , पशुबलि , जाति-पाति भेदभाव जिस समय बढ़ गया उसी समय महावीर और बुद्ध का जन्म हुआ था । दोनों महापुरुषों ने इन कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाई और अहिंसा को बढावा दिया ।       Mahavir swami 24th Tirthakar of Jain Dharma ईसा पूर्व 599 में वैशाली गणतंत्र के कुण्डलपुर में पिता सिद्धार्थ और माता त्रिशला के यहाँ तीसरी संतान के रूप में वर्धमान का जन्म हुआ था । यही वर्धमान आगे चलकर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी बने । महावीर को वीर , अतिवीर और सन्मति भी कहा जाता है । महावीर स्वामी का जीवन उनके जन्म के ढाई हजार साल बाद भी उनके लाखों अनुयायियों के साथ ही पूरी दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाता है । महावीर स्वामी पंचशील सिद्धांत के प्रवर्तक थे । जैन ग्रंथो के अनुसार 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी के मोक्ष प्राप्ति के 298 वर्ष बाद महावीर स्वामी का जन्म चैत्र मास के 13वें दिन में हुआ था । बिहार के मुजफ्फरपुर जिले का आज जो बसाढ़ गांव है वह उस समय का वैशाली थ

जैन धर्म के 24 तीर्थंकर कौन थे / Jain Dharma ke 24 Tirthakar kaun the

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जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए । तीर्थंकर का अर्थ है - तारने वाला । तीर्थंकर को अरिहंत कहा जाता है । अरिहंत का मतलब होता है , जिसने अपने अंदर के शत्रुओं पर विजय पा लिया हो । एक ऐसा व्यक्ति जिसने कैवल्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया हो । अरिहंत का मतलब भगवान भी होता है । जैन धर्म में 24 तीर्थंकर हुए । 1. ऋषभदेव :-  ऋषभदेव का जन्म चैत्र मास की कृृष्ण की अष्टमी-नवमी को अयोध्या मे हुआ । इनके दो पुत्र भरत और बाहुुबली तथा दो पुत्रियां ब्रह्मी  और सुुंदरी हुई । ऋषभनाथ को जन्म से ही समस्त कलााओं का ज्ञान था । उन्होंने हजारों बर्षों तक सुखपूर्वक राज्य किया और फिर अपने राज्य को अपने पुत्रों में बांटकर खुद दिगम्बर तपस्वी बन गए । उनके साथ सैकड़ो लोगों ने उनका अनुसरण किया । जैन मान्यता है कि पूर्णता प्राप्त करने से पूर्व तक तीर्थंकर मौन रहते हैं । अतः उन्हें एक वर्ष तक भूखे रहना पड़ा । पूर्णता प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपना मौन व्रत तोड़ा और संपूर्ण आर्यावर्त में लगभग 99 साल तक लोगों को जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्त होने का उपाय बताया । अपनी आयु के 14 दिन शेष रहने पर भगवान ऋषभनाथ हिमालय पर्वत के क

शांतनु और गंगा की कहानी / shantanu aur Ganga ki kahani

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पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी से अत्रि , अत्रि से चन्द्रमा , चन्द्रमा से बुध , बुध से इलानंदन पुरूरवा का जन्म हुआ । पुरूरवा से आयु , आयु से राजा नहुष और नहुष से राजा ययाति हुए । ययाति से पुरू हुए । पुरू के कुल मे दुष्यंत , भरत हुए भरत के कुल में कुरू हुए जिनका वंश कौरव कहलाया । कौन थे शांतनु  कुरू के कुल मे राजा प्रतीप हुए । जिनके पुत्र हुए महाराज शांतनु । शांतनु और गंगा के पुत्र देवव्रत हुए जो आगे चलकर अपनी कठोर प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाए । भीष्म आजीवन ब्रह्मचारी रहे इसलिए उनके बाद कुरु वंश आगे नहीं चला । भीष्म अंतिम कौरव थे । महाभारत काल में देवी - देवता धरती पर विचरण किया करते थे । किसी खास मंत्र के आह्वान से वे प्रकट हो जाते थे । एक बार पुत्र कामना से हस्तिनापुर के राजा प्रतीप ने गंगा किनारे समाधि लगाकर तपस्यारत हुए । उनके तप , रूप , सौंदर्य से गंगा उनपर मोहित हो गई और आकर उनकी दाहिनी जंघा पर बैठ गई और कहने लगीं कि राजन् मै आपसे विवाह करना चाहतीं हूँ । राजा प्रतीप ने कहा - देवी आप मेरी दाहिनी जंघा पर बैठी है पत्नी तो वामंअगी होती हैं । दाहिनी जंघा तो पुत्र का प्रतीक ह

तारा रानी की कहानी / Tara Rani ki kahani

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      Tara Rani ki kahani राजा स्पर्श माता भगवती के पुजारी थे, दिन रात माता की पूजा और ध्यान करते रहते थे । माता ने भी उन्हें राजपाट , धन-दौलत , ऐशो-आराम के सभी साधन दिया था परंतु फिर भी एक कमी थी । राजा को कोई संतान न थी । यही दुख उन्हें हमेशा सताता रहता था । वे माता से हरदम प्रार्थना करते कि मां मुझे आपने सब कुछ दिया है बस एक संतान दे दे तो मेरा जीवन पूर्ण हो जाएगा । मेरे वंश को आगे बढ़ाने वाला एक पुत्र मुझे दे दो ।                  एक दिन माता भगवती ने उनकी प्रार्थना सुन ली और उन्हें सपने में आकर दर्शन दिया । उन्होंने कहा वत्स मै तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ और तुझे यह वरदान देती हूँ कि जल्दी ही तुम्हारे घर में दो कन्याएं जन्म लेंगी । कुछ समय पश्चात राजा के घर में एक कन्या का जन्म हुआ । राजा ने अपने दरबारियों , पंडितो एवं ज्योतिषियों को बुलाया और बच्ची की जन्म कुंडली तैयार करने का आदेश दिया । पंडित तथा ज्योतिषियों ने कन्या की कुंडली तैयार की और तत्पश्चात सभी ने आकर राजा को बताया कि राजन् यह कन्या तो साक्षात देवी है । यह कन्या जहां भी कदम रखेगी वहां खुशियाँ ही खुशिया

विष्णु पुराण सृष्टि की उत्पत्ति / Vishnu Puran shristi ki Utpatti

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Vishnu Puran Shristi ki Utpatti 1 / 1 विष्णु पुराण में भगवान विष्णु की महिमा  विष्णु पुराण अठारह पुराणों में अत्यंत महत्वपूर्ण तथा प्राचीन है । इसकी रचना पराशर मुनि द्वारा की गई थी । इसके प्रतिपाद्य भगवान विष्णु है जो सृष्टि के आदिकारण , नित्य , अक्षय , अव्यय तथा एकरस है । इस पुराण में आकाश आदि भूतों का परिणाम , समुद्र , सूर्य आदि का परिणाम , पर्वत देवतादि की उत्पत्ति , मन्वन्तर , कल्प विभाग , संपूर्ण धर्म एवं देवर्षि तथा राजर्षियों के चरित्र का विशद वर्णन है । भगवान विष्णु के प्रधान होते हुए भी यह पुराण विष्णु और शिव के अभिन्नता का प्रतिपादक है । विष्णु पुराण में मुख्य रूप से श्रीकृष्ण चरित्र का वर्णन है । श्रीराम कथा का भी संक्षेप में वर्णन मिलता है । अष्टादश महापुराणों मे श्रीविष्णु पुराण का स्थान बहुत ऊंचा है । इनमें अन्य विषयों के साथ भूगोल , कर्मकांड , ज्योतिष , और राजवंश और श्रीकृष्ण चरित्र आदि प्रसंगों का बड़ा ही अनूठा और विशद वर्णन मिलता है । श्रीविष्णु पुराण में इस ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति , वर्ण व्यवस्था , आश्रम व्यवस्था , भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की सर्वव्यापक

अर्जुन ने क्यों मारा जयद्रथ को

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महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य द्वारा बनाये गए चक्रव्यूह में फंस कर जयद्रथ द्वारा अभिमन्यु का वध किया जाता है । युद्ध से लौटे अर्जुन के लिए उनके पुत्र की मृत्यु असहनीय हो जाता है और वे आवेशित होकर प्रतिज्ञा कर बैठते हैं कि कल के सूर्य अस्त से पहले अभिमन्यु के हत्यारे जयद्रथ का वध करेंगे या फिर आत्मदाह कर लेंगे । Arjuna killed Jayadratha in Mahabharata  1 / 1 कैसे सिखा अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदना :- एक बार जब सुभद्रा गर्भवती थी तो अर्जुन उन्हें चक्रव्यूह कैसे भेदा जाता है और कैसे उससे निकला जाता है बता रहे थे । सुभद्रा ने चक्रव्यूह भेदने की कला तो जान ली परंतु वे बीच में ही सो गई । जिससे उनके गर्भ में अभिमन्यु ने सिर्फ चक्रव्यूह भेदना ही सीखा उससे निकलना न सीख सके । 1 / 2 अर्जुन का रणक्षेत्र से दूर चले जाना और निहत्थे अभिमन्यु का वध Jayadratha vadh in Mahabharata एक दिन अर्जुन युद्ध करते करते दूर निकल गए या यूँ कहें कि यह एक चाल थी कि अर्जुन को रणभूमि से दूर रखा जाए । कौरवों ने अर्जुन को दूसरी तरफ उलझा कर रखा वही द्रोणाचार्य ने पांडवो को पराजित करने के लिए चक्रव्यूह

भीम और हनुमान की कहानी / Bheem aur hanuman ki kahani

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भीम और हनुमान की कहानी / BHEEM AND HANUMAN STORY महाभारत के पांच पांडव भाइयों मे से एक भीम का जन्म पवनदेव के आशीर्वाद स्वरुप हुआ था । क्योंकि माता कुंती को यह वरदान प्राप्त था कि वह जिस भी देवता का आह्वान करके उनसे पुत्र की इच्छा रखेगी उस देवता से उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी । इस तरह पांडु भीम के धर्मपिता हुए । भीम युधिष्ठिर से छोटे और अर्जुन , नकुल और सहदेव से बड़े थे । कहते हैं कि भीम मे सौ हाथियों का बल था । वे हमेशा भोजन के बारे में ही सोचते और अगर भोजन मिल जाए तो बस भीम को और कुछ नहीं दिखता था । भीम का पूरा नाम भीमसेन था ।  उनका विवाह द्रौपदी और हिडिम्बा के साथ हुआ था । Also Read :-  भीम और राक्षसी हिडिम्बा का विवाह/ Bheem aur rakchhasi hidimba ka vivah द्रौपदी से उन्हें सुतासोमा और हिडिम्बा से घटोत्कच नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी । उनके दोनों पुत्र महाभारत युद्ध में ही मारे गए । भीम बहुत विशालकाय शरीर के हष्ट-पुष्ट थे । उन्हें अपनी ताकत का बहुत घमंड था । भगवान श्रीकृष्ण ने उनका यह घमंड तोड़ने के लिए हनुमान जी को बुलाया । हनुमान जी त्रेता युग में भगवान राम के अनन्य भक्त थ

अर्जुन सुभद्रा प्रेम मिलन / Arjun shubhadra prem milan

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   सुभद्रा से कितना प्रेम करते थे अर्जुन Arjun shubhadra prem milan अर्जुन सुभद्रा प्रेम मिलन | Arjuna and shubhadra love story महाभारत में अर्जुन की चार पत्नियों का जिक्र मिलता है - द्रौपदी , उलूपी , चित्रांगदा और सुभद्रा ।  परंतु अपनी चारों पत्नियों मे से द्रौपदी और सुभद्रा के साथ रहे । सुभद्रा श्रीकृष्ण और बलराम की बहन थी । बलराम और सुभद्रा का जन्म वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी से हुआ था ।                                  जब अर्जुन द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तभी उनकी भेंट सुभद्रा के चचेरे भाई गदा से हुई थी जो अक्सर सुभद्रा के रूप व गुणों की चर्चा अर्जुन से किया करते थे । अर्जुन को सुभद्रा से मन ही मन प्रेम हो जाता है । एक बार कि बात है , अर्जुन को बारह साल की लंबी यात्रा पर जाना पडता है इसी क्रम में उनकी मुलाकात उलूपी और चित्रांगदा से होती हैं । अर्जुन अपनी यात्रा जारी रखते हैं और इसी क्रम में द्वारका पहुँचते हैं जहाँ अपने परम मित्र श्रीकृष्ण से उनकी मुलाकात होनी है । अर्जुन के मन मे अपने वर्षों पुराने प्रेम सुभद्रा को देखने की इच्छा होती है । अर्जुन यति का रूप

घटोत्कच का वध-महाभारत / Ghatotkach ka vadh-Mahabharata

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        Ghatotkach ka vadh -Mahabharata          महाभारत युद्ध में अभिमन्यु वध के बाद अर्जुन ने जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा ली । युद्ध का 14 वां दिन था , अर्जुन ने जयद्रथ का वध कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की । युद्ध के नियम पहले भी तोड़े गए थे और आज जयद्रथ वध के बाद सूरज डूबा किन्तु युद्ध की समाप्ति का शंख नहीं बजा । तभी एक ऐसा तूफान आया जिससे पूरी कौरव सेना में भगदड़ मच गई । एक अति विशालकाय राक्षस खड़ा है सबकी जैसे जान ही निकल गई । यह विशालकाय राक्षस और कोई नहीं बल्कि भीम और राक्षसी हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच थे जिन्होंने आज ही युद्ध भूमि पर कदम रखा था और बिना युद्ध किये ही कौरवों की सेना में हाहाकार मचा दिया था । कौरवों की सेना में भारी नुकसान करने के पश्चात घटोत्कच जाकर अपने पिता और अन्य पांडवो तथा श्रीकृष्ण से जाकर मिलते है । सभी घटोत्कच का स्वागत करते हैं ।  दूसरी ओर कर्ण अर्जुन को मारने की योजना बनाते हैं । कर्ण के पास इन्द्र की दी हुई एक ऐसी अमोघ शक्ति से जो कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है । कर्ण ने यह शक्ति अर्जुन के लिए बचाकर रखी थी ।                 अगले दिन फिर युद्ध शुर