संदेश

नवंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

शिव और सती की कथा

चित्र
ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष  की पुत्री के रूप में देवी आदि शक्ति  ने माता सती के रूप मेंं जन्म लिया । स्वंयभू मनुु की पुत्री प्रसूति के गर्भ से सोलह कन्याओं का जन्म हुआ था जिनमें से एक सती थी । उस समय शिव और शक्ति अलग-अलग थे इसलिए ब्रह्मा जी ने अपने पुत्र दक्ष से शक्ति की उपासना करने के लिए कहा ताकि माता उनकी पुत्री के रूप में जन्म ले सके और उन दोनों का मिलन हो सके । प्रजापति दक्ष की सभी कन्याएं एक से एक गुणवती थी। पहली कन्या स्वाहा का विवाह अग्नि देव दूसरी कन्या स्वधा का विवाह पितृगण के साथ माता सती का विवाह शिवजी के साथ तथा शेष तेरह कन्याओं का विवाह धर्म के साथ हुआ । समयानुसार जब देवी सती विवाह योग्य हुई तो दक्ष ने अपने पिता ब्रह्मा जी की आज्ञानुसार अपनी पुत्री का विवाह शिवजी के साथ कर दिया । देवी अपने पति के साथ कैलाश में खुशी-खुशी रहने लगी । एक बार जब ब्रह्मा जी ने देवलोक में एक सभा का आयोजन किया था तो सभी देवता वहां मौजूद थे। स्वयं शिव भी उस सभा में पधारे हुए थे। जब प्रजापति दक्ष वहां पहुंचे तो सभी देवता उनके स्वागत में खड़े हो गए परंतु शिव जी ब्रह्मा जी के साथ

नल और दमयंती की कथा

चित्र
प्राचीन समय में नल नामक राजा निषद देश में राज्य करते थे। नल बहुत ही सुंदर , वीर और प्रतापी राजा थे । मगर उन्हें जुआ खेलने की बुरी लत थी ।                                        उन्हीं दिनों विदर्भ (पूर्वी महाराष्ट्र) में भी एक बड़े प्रतापी राजा हुआ करते थे जिनका नाम भीमक था । राजा भीमक ने ऋषि दमन को प्रसन्न करके चार संतानें प्राप्त की थी । तीन पुत्र और एक पुत्री । पुत्री का नाम दमयंती था जो लक्ष्मी के समान सुंदर और गुणवती थी । दमयंती के रूप की चर्चा दूर-दूर तक थी । राजा नल ने भी दमयंती के बारे मे सुना और उससे प्रेम करने लगे। एक बार वे जब अपने बगीचे में घूम रहे थे तो वहां उन्होंने कुछ हंसो को देखा और उनमें से एक को पकड़ लिया । हंस ने राजा से कहा कि आप मुझे छोड़ दीजिए तो हम सभी दमयंती के पास जाकर आपकी ऐसी प्रंशसा करेंगे कि वह आपसे विवाह कर लेगी । नल ने हंस को छोड़ दिया और वे सभी उडकर विदर्भ देश की ओर चले।  वहां वे सभी दमयंती के बगीचे में गए । दमयंती ने हंसो को देखा तो वह बहुत खुश हुई और उन्हें पकड़ने का प्रयास करने लगी ।                                       दमयंती जिस भी हंस क

सावित्री और सत्यवान

चित्र
प्राचीन समय में दक्षिण कश्मीर  में मद्रदेश नामक एक राज्य था । वहां के राजा का नाम अश्वपति था।  राजा की एकमात्र पुुत्री का नाम सावित्री  था । वह बहुत सुुुन्दर और सुशील कन्या थी । जब सावित्री विवाह के योग्य हुुुई तो राजा को उसके लिए योग्य वर की चिन्ता हुुई और उन्होंनेे वर की तलाश शुरू  कर दिया। बहुत ढूूँढने पर भी कोई वर राजा को अपनी पुत्री  के लिए पंसद नहीं आया तब उन्होंने सावित्री से खुद कोई वर चुुन लेने के लिए कहा । एक बार सावित्री राजर्षियों के तपोवन से गुजर रही थी , तभी वहां उसने एक युवक को देखा जो घोड़ो के बच्चे के साथ खेल रहा था । उसके सिर पर जटा और शरीर में छाल के वस्त्र तथा मुख पर अद्भुत तेज था । जब रथ वहां ठहरा तो वह युवक सावित्री का परिचय पूछने गया और परिचय पाकर राजकुमारी का अपने आश्रम में स्वागत किया तत्पश्चात अपना नाम सत्यवान तथा अपनेे पिता का नाम धुुमंतसेन   बताया जो पूर्व में सालवा देश के राजा थे । अपना राज्य और आखों की ज्योति खो देने के पश्चात इसी तपोवन में तपस्या कर रहे हैं । अगले दिन सावित्री वहां से अपने राजमहल लौटी और अपने पिता को सत्यवान के बारे में बताया । उ

क्यों मनाया जाता है धनतेरस का त्योहार

चित्र
                                                                                 कार्तिक मास की कृृष्ण त्रियोदशी के दिन हिन्दुु धर्म में धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है । ऐसा माना जाता है कि इसी दिन भगवान धन्वंतरि समुद्र मंथन से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे । धन्वंतरि को भगवान विष्णु का ही अंंशावतार माना जाता है । संसार में चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद के प्रसार के लिए ही भगवान ने धन्वंतरि का अवतार लिया था।  इस दिन धन्वंतरि के प्रकट होने के उपलक्ष्य में धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है । हिन्दु पौराणिक कथाओं के अनुसार देवताओं ने असुरों के साथ मिलकर अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन किया था। मंथन की प्रक्रिया के दौरान ओर भी रत्नों की प्राप्ति हुई थी जो बहुमूल्य थी । सबसे अंत मे अमृत निकला था जिसे असुरों ने देवताओं से छीन लिया था। समुद्र मंथन से ही धन और संपन्नता की देवी लक्ष्मी निकली है। धनतेरस में किसी भी धातु से बनी वस्तु को खरीदने का रिवाज है।  इसके अलावा लक्ष्मीजी और गणेश जी की मूर्ति को भी लोग इस दिन बड़ी श्रद्धा से खरीदते हैं। कहा जाता है कि इस दिन धातु की बनी वस्तुएं खरीदना बहुत

जनपद कल्याणी नंदा और बुद्ध

गौतम बुद्ध के सौतेले भाई और महाप्रजापति गौतमी के पुत्र का नाम नंद था। नंंद कुमार का विवाह उस समय की अपूर्ण सुुंदरी जनपद कल्याणी नंदा के साथ होने वाली थी । वह भी नंंद कुमार को बहुत पसंद करती थी और इस विवाह से बहुत खुुुश थी । जिस दिन उन दोनों का विवाह होने वाला था जनपद कल्याणी नंदा बहुत रोमांचित थी और अपने विवाह की तैयारियों को देखकर फूली न समा रही थी, उसी समय उसने नंद कुमार को बुद्ध के साथ देखा।  उनके हाथ में भिक्षाटन का कटोरा था और वे दोनों महल से बाहर जा रहे थे। शाम के समय विवाह मुहूर्त से पहले उन्हें यह सूचना मिली कि नंद ने भी गृहस्थ जीवन त्याग दिया है और बौद्ध भिक्षुक बन गए हैं। इस समाचार से जनपद कल्याणी नंदा को गहरा आघात लगा और वह मूर्छित हो गई। धीरे-धीरे वह इस घटना से उबरने लगी परंतु अब उन्हें अपना जीवन व्यर्थ लगने लगा और उन्होंने भी बौद्ध भिक्षुणी बनने की ठान ली । यद्यपि उसने सारी मोह माया त्याग दिया परंतु अपनी सुंदरता और यौवन पर उन्हें अभी भी गर्व था। उनका मोह कम नहीं हुआ था और वे कभी इस बात को न सोचती कि यह सुंदरता एक दिन धूमिल हो जाएगी । एक दिन वह मठ की स्त्रिय

महाप्रजापति गौतमी

चित्र
बात उस समय की है जब बौद्ध भिक्षुक संघ में स्त्रियों को जाने की अनुमति प्राप्त नहीं थी । एक बार गौतम बुद्ध शाक्यों के देश कपिलवस्तु के नियोग्राधराम में विहार कर रहे थे तभी महाप्रजापति गौतमी वहां आई और बुद्ध से निवेदन किया -"भन्ते ! अच्छा होता अगर स्त्रियाँ भी आपके दिखाए धर्म-विनय में शामिल हो ।" गौतमी ने तीन बार प्रार्थना की परंतु बुद्ध ने अस्वीकार कर दिया और वहां से वैशाली चले गए । कुछ समय पश्चात गौतमी अपना सिर मुंडवाकर पांच सौ शाक्य स्त्रियों के साथ वैशाली पहुंची । वह बहुत उदास थी तो बुद्ध के शिष्य आनंद ने उनसे दुख का कारण पूछा । गौतमी ने कहा कि वह बौद्ध धर्म में स्त्रियों को प्रव्रज्या दिलवाना चाहती है परंतु बुद्ध इसके लिए सहमति नहीं दे रहे हैं । फलस्वरूप आनंद ने बुद्ध से तीन बार विनती की परंतु बुद्ध ने फिर भी अस्वीकार कर दिया। तब आनंद ने कहा - "भन्ते ! क्या आपके द्वारा प्रवेदित धर्म घर से बेघर प्रव्रजित हो कर स्त्रियाँ अर्हत्व का साक्षात कर सकती हैं " बुद्ध ने कहा -"बिलकुल साक्षात कर सकती हैं आनंद!" तब आनंद ने पुनः कहा  -"भन्ते  ! अग

रानी लक्ष्मीबाई का बचपन

चित्र
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई  के बचपन का नाम मणिकर्णिका था इसलिए सभी उन्हें प्यार से मनु कहा करते थे। बचपन में ही मनु की माता चल बसी थी इसलिए उनके पिता मोरोपंत  ने नन्हीं बालिका को बड़े ही लाड-प्यार से पाला था। चूूंकि वे मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय  की सेवा में थे इसलिए अपने साथ वे मनु को भी दरबार मेंं ले जाया करतेे थे क्योंकि उतनी छोटी बच्ची को वे अकेले नहींं छोड़ना चाहते थे । दरबार में मनु अपनी सुंदरता और चंचलता के कारण सबकी प्रिय बन गई थी और पेशवा तो प्यार से मनु को "छबीली" कहा करते थे । मनु को बचपन से ही अस्त्र-शस्त्रों और घुड़सवारी का शौक था और चूंकि वह अपने पिता के साथ दरबार आया जाया करती थी इसलिए उसे तलवारबाजी और घुड़सवारी सिखने का मौका भी मिला। वैसे भी अन्य बालिकाओं के मुकाबले मनु को ज्यादा स्वतंत्रता मिली हुई थी । बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब मनु के बचपन के साथी हुआ करते थे  । एक बार नाना साहब हाथी की सवारी करने निकले जब मनु ने उन्हें देखा तो वह भी हाथी की सवारी करने के लिए मचल उठी और नाना साहब से कहा कि वह भी उनके साथ हाथी पर चढ़ना चाहती है लेक

तुलसीदास जीवन परिचय

तुलसीदास मध्यकाल के भक्त कवियों में सेे एक थे , इनका पूरा जीवन आश्चर्यों से भरा पड़ा है। कुछ विद्वान तुुुुलसीदास जी को आदिकवि वाल्मीकि जी का भी अवतार मानते हैं। इनका जन्म राजापुर, उत्तर प्रदेश हुआ माना जाता है , राजापुर जिला चित्रकूूूट में स्थित एक गांव है। आत्माराम दुबे नामक ब्राहमण केे घर इनका जन्म 1511ई में हुआ था । इनकी माता का नाम हुलसी था । ऐसा माना जाता है कि तुुुलसीदास जी बारह महीने माँ के गर्भ में रहे इसलिए जन्म के समय ही इनके दांत आ चुके थे और तो और पैदा होते ही उन्होंने राम नाम का उच्चारण किया था इसलिए इनका नाम रामबोला पड़ा । जन्म लेने के दूसरे दिन ही इनकी माता की मृत्यु हो गई इसलिए इनके पिता ने इन्हें  एक दासी को दे दिया । जब रामबोला पांच वर्ष का हुआ तो वह दासी भी मर गई और इस तरह रामबोला अनाथों की तरह अपना जीवन जीने लगा । संत नरहरिदास ने इसके बाद इनका पालन-पोषण अयोध्या ले जाकर किया तथा विधिवत यज्ञोपवीत-संस्कार कर इनका नाम रामबोला से तुलसीराम रखा और वेद-शास्त्रों की शिक्षा दी ।                                 बचपन में ही तुलसीदास जी बड़ी प