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कफन

महान कथाकार प्रेमचंद की एक अद्भुत कहानी है कफन  जिसे  पढ़कर समझ आता है कि मौत गरीबी से बढ़कर नहीं होती है। कथा के शुरूआत में जब बुधिया जाड़े की रात में अपने घर में प्रसव पीड़ा से छटपटाती है तो उसका पति और ससुर उसके कष्ट से बेपरवाह होकर आग में मीठे आलू भुनकर खा रहे होते है और अंत में जब वह मर जाती है तो उसके लिए कफन के पैसे लोगों से मांगकर फिर उस कफन के पैसे से खुद भर पेट भोजन करते हैं और शराब पीते हैं। कहानी में लेखक धीसू और माधव के जरिए गरीबी और भूख के कारण हुए मनुष्य के नैतिक पतन को भली-भांति परिचित कराते हैं। कहानी के माध्यम से हमें यह भी समझ आता है कि अगर मनुष्य को मूलभूत सुविधाएं जैसे खाना कपड़े भी न मिले तो ऐसे प्राणी के लिए मृत्यु भी तुच्छ लगती है। 

रानी की कहानी / Rani ki kahani

बहुत पहले की बात है, एक लड़की थी रानी । फूलों सी कोमल और नाजुक । कहीं की राजकुमारी न थी लेकिन अपने माता-पिता और सात भाइयों के लिए किसी राजकुमारी से किसी मायने में कम नहीं थी।                                 रानी की जिस भी चीज की इच्छा होती उसके माता पिता और सातों भाई मिलकर उस चीज को तुरंत उसे लाकर रख दिया करते थे । वह नाजो से पली बढ़ी थी जिसने कभी एक सुई तक नहीं उठाई और करे भी क्यों भला ? सात सात भाइयों की इकलौती बहन जो ठहरी।                        लेकिन उसकी भाभियों से उसकी यह खातिरदारी नहीं देखी जाती थी । भाभियों को अपनी ननद फूटी आंखों न सुहाती थी लेकिन वे करती भी क्या  अपने पतियों से कुछ कह भी नहीं सकती थी।        सिर्फ एक जो छोटी भाभी थी, वह अपनी ननद रानी को बहुत प्यार करती थी ।                               ...

कुसंगति का परिणाम

उज्जयिनी नगर को जाने वाले मार्ग में एक पाकड़ का विशाल वृक्ष था। उस पर हंस और एक कौआ साथ-साथ रहते थे। वृक्ष बहुत घना था इसलिए उसकी छाया भी बहुत विशाल थी। आने-जाने वाले पथिक उस छाया में विश्राम किया करते थे। एक दिन ग्रीष्म के महीने में एक दोपहर को थका-मांदा एक पथिक वहां पहुंचा और उस वृक्ष की छाया में विश्राम करने लगा। उसने अपने धनुष-बाण एक ओर रख दीए। ठंडक का सुखद अहसास मिलते ही पथिक को नींद आ गई। अचानक निद्रा में उसका मुख खुल गया। धीरे-धीरे वृक्ष की छाया ने भी रूख बदला और सूर्य की गर्म-गर्म किरणें उसके मुख पर पड़ने लगीं। पथिक की ऐसी अवस्था देख हंस को उस पर दया आ गई। उसने अपने पंख इस प्रकार फैला दिए कि पथिक के मुख पर छाया हो गई।                          दुष्ट कौआ पराया सुख भला कहां देखता है। वह अपने स्थान से उड़ा और ठीक पथिक के मुंह के पास जाकर उसके खुले मुख में विष्ठा कर दी। फिर वह तो तत्काल वहां से उड़ गया। पर हंस अपने स्थान पर बैठा ही रहा।            कौए के इस कुकृत्य से पथ...