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शांतनु और गंगा की कहानी / shantanu aur Ganga ki kahani

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पुराणों के अनुसार ब्रह्मा जी से अत्रि , अत्रि से चन्द्रमा , चन्द्रमा से बुध , बुध से इलानंदन पुरूरवा का जन्म हुआ । पुरूरवा से आयु , आयु से राजा नहुष और नहुष से राजा ययाति हुए । ययाति से पुरू हुए । पुरू के कुल मे दुष्यंत , भरत हुए भरत के कुल में कुरू हुए जिनका वंश कौरव कहलाया । कौन थे शांतनु  कुरू के कुल मे राजा प्रतीप हुए । जिनके पुत्र हुए महाराज शांतनु । शांतनु और गंगा के पुत्र देवव्रत हुए जो आगे चलकर अपनी कठोर प्रतिज्ञा के कारण भीष्म कहलाए । भीष्म आजीवन ब्रह्मचारी रहे इसलिए उनके बाद कुरु वंश आगे नहीं चला । भीष्म अंतिम कौरव थे । महाभारत काल में देवी - देवता धरती पर विचरण किया करते थे । किसी खास मंत्र के आह्वान से वे प्रकट हो जाते थे । एक बार पुत्र कामना से हस्तिनापुर के राजा प्रतीप ने गंगा किनारे समाधि लगाकर तपस्यारत हुए । उनके तप , रूप , सौंदर्य से गंगा उनपर मोहित हो गई और आकर उनकी दाहिनी जंघा पर बैठ गई और कहने लगीं कि राजन् मै आपसे विवाह करना चाहतीं हूँ । राजा प्रतीप ने कहा - देवी आप मेरी दाहिनी जंघा पर बैठी है पत्नी तो वामंअगी होती हैं । दाहिनी जंघा तो पुत्र का प्रतीक ह

अर्जुन ने क्यों मारा जयद्रथ को

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महाभारत युद्ध के समय द्रोणाचार्य द्वारा बनाये गए चक्रव्यूह में फंस कर जयद्रथ द्वारा अभिमन्यु का वध किया जाता है । युद्ध से लौटे अर्जुन के लिए उनके पुत्र की मृत्यु असहनीय हो जाता है और वे आवेशित होकर प्रतिज्ञा कर बैठते हैं कि कल के सूर्य अस्त से पहले अभिमन्यु के हत्यारे जयद्रथ का वध करेंगे या फिर आत्मदाह कर लेंगे । Arjuna killed Jayadratha in Mahabharata  1 / 1 कैसे सिखा अभिमन्यु ने चक्रव्यूह भेदना :- एक बार जब सुभद्रा गर्भवती थी तो अर्जुन उन्हें चक्रव्यूह कैसे भेदा जाता है और कैसे उससे निकला जाता है बता रहे थे । सुभद्रा ने चक्रव्यूह भेदने की कला तो जान ली परंतु वे बीच में ही सो गई । जिससे उनके गर्भ में अभिमन्यु ने सिर्फ चक्रव्यूह भेदना ही सीखा उससे निकलना न सीख सके । 1 / 2 अर्जुन का रणक्षेत्र से दूर चले जाना और निहत्थे अभिमन्यु का वध Jayadratha vadh in Mahabharata एक दिन अर्जुन युद्ध करते करते दूर निकल गए या यूँ कहें कि यह एक चाल थी कि अर्जुन को रणभूमि से दूर रखा जाए । कौरवों ने अर्जुन को दूसरी तरफ उलझा कर रखा वही द्रोणाचार्य ने पांडवो को पराजित करने के लिए चक्रव्यूह

भीम और हनुमान की कहानी / Bheem aur hanuman ki kahani

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भीम और हनुमान की कहानी / BHEEM AND HANUMAN STORY महाभारत के पांच पांडव भाइयों मे से एक भीम का जन्म पवनदेव के आशीर्वाद स्वरुप हुआ था । क्योंकि माता कुंती को यह वरदान प्राप्त था कि वह जिस भी देवता का आह्वान करके उनसे पुत्र की इच्छा रखेगी उस देवता से उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी । इस तरह पांडु भीम के धर्मपिता हुए । भीम युधिष्ठिर से छोटे और अर्जुन , नकुल और सहदेव से बड़े थे । कहते हैं कि भीम मे सौ हाथियों का बल था । वे हमेशा भोजन के बारे में ही सोचते और अगर भोजन मिल जाए तो बस भीम को और कुछ नहीं दिखता था । भीम का पूरा नाम भीमसेन था ।  उनका विवाह द्रौपदी और हिडिम्बा के साथ हुआ था । Also Read :-  भीम और राक्षसी हिडिम्बा का विवाह/ Bheem aur rakchhasi hidimba ka vivah द्रौपदी से उन्हें सुतासोमा और हिडिम्बा से घटोत्कच नामक पुत्र की प्राप्ति हुई थी । उनके दोनों पुत्र महाभारत युद्ध में ही मारे गए । भीम बहुत विशालकाय शरीर के हष्ट-पुष्ट थे । उन्हें अपनी ताकत का बहुत घमंड था । भगवान श्रीकृष्ण ने उनका यह घमंड तोड़ने के लिए हनुमान जी को बुलाया । हनुमान जी त्रेता युग में भगवान राम के अनन्य भक्त थ

अर्जुन सुभद्रा प्रेम मिलन / Arjun shubhadra prem milan

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   सुभद्रा से कितना प्रेम करते थे अर्जुन Arjun shubhadra prem milan अर्जुन सुभद्रा प्रेम मिलन | Arjuna and shubhadra love story महाभारत में अर्जुन की चार पत्नियों का जिक्र मिलता है - द्रौपदी , उलूपी , चित्रांगदा और सुभद्रा ।  परंतु अपनी चारों पत्नियों मे से द्रौपदी और सुभद्रा के साथ रहे । सुभद्रा श्रीकृष्ण और बलराम की बहन थी । बलराम और सुभद्रा का जन्म वासुदेव की दूसरी पत्नी रोहिणी से हुआ था ।                                  जब अर्जुन द्रोणाचार्य से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तभी उनकी भेंट सुभद्रा के चचेरे भाई गदा से हुई थी जो अक्सर सुभद्रा के रूप व गुणों की चर्चा अर्जुन से किया करते थे । अर्जुन को सुभद्रा से मन ही मन प्रेम हो जाता है । एक बार कि बात है , अर्जुन को बारह साल की लंबी यात्रा पर जाना पडता है इसी क्रम में उनकी मुलाकात उलूपी और चित्रांगदा से होती हैं । अर्जुन अपनी यात्रा जारी रखते हैं और इसी क्रम में द्वारका पहुँचते हैं जहाँ अपने परम मित्र श्रीकृष्ण से उनकी मुलाकात होनी है । अर्जुन के मन मे अपने वर्षों पुराने प्रेम सुभद्रा को देखने की इच्छा होती है । अर्जुन यति का रूप

घटोत्कच का वध-महाभारत / Ghatotkach ka vadh-Mahabharata

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        Ghatotkach ka vadh -Mahabharata          महाभारत युद्ध में अभिमन्यु वध के बाद अर्जुन ने जयद्रथ वध की प्रतिज्ञा ली । युद्ध का 14 वां दिन था , अर्जुन ने जयद्रथ का वध कर अपनी प्रतिज्ञा पूरी की । युद्ध के नियम पहले भी तोड़े गए थे और आज जयद्रथ वध के बाद सूरज डूबा किन्तु युद्ध की समाप्ति का शंख नहीं बजा । तभी एक ऐसा तूफान आया जिससे पूरी कौरव सेना में भगदड़ मच गई । एक अति विशालकाय राक्षस खड़ा है सबकी जैसे जान ही निकल गई । यह विशालकाय राक्षस और कोई नहीं बल्कि भीम और राक्षसी हिडिम्बा के पुत्र घटोत्कच थे जिन्होंने आज ही युद्ध भूमि पर कदम रखा था और बिना युद्ध किये ही कौरवों की सेना में हाहाकार मचा दिया था । कौरवों की सेना में भारी नुकसान करने के पश्चात घटोत्कच जाकर अपने पिता और अन्य पांडवो तथा श्रीकृष्ण से जाकर मिलते है । सभी घटोत्कच का स्वागत करते हैं ।  दूसरी ओर कर्ण अर्जुन को मारने की योजना बनाते हैं । कर्ण के पास इन्द्र की दी हुई एक ऐसी अमोघ शक्ति से जो कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है । कर्ण ने यह शक्ति अर्जुन के लिए बचाकर रखी थी ।                 अगले दिन फिर युद्ध शुर

कर्ण अर्जुन का युद्ध और कर्ण वध - महाभारत

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                          द्रोणाचार्य की मृत्यु के पश्चात दुर्योधन पुनः शोक से आतुर हो उठा तब कर्ण ने उसकी सेना का सेनापति बनना स्वीकार किया । पांडव सेना का आधिपत्य अर्जुन को मिला । कर्ण और अर्जुन के बीच विभिन्न प्रकार के अस्त्रों - शस्त्रों से भयंकर युद्ध हुआ । सत्रहवें दिन से पहले कर्ण का सामना अर्जुन को छोड़ सभी पांडवो से हुआ था । उसने महाबली भीम से लेकर सभी पांडवो को एक एक कर युद्ध में पराजित किया परंतु माता कुंती को दिए वचन अनुसार किसी को नहीं मारा । महाभारत के सत्रहवें दिन आखिरकार कर्ण और अर्जुन का आमना-सामना हुआ । इस संग्राम में दोनों ही बराबर थे । कर्ण को उसके गुरु परशुराम से विजय नामक धनुष प्राप्त था। दुर्योधन के कहने पर  पांडवो के मामा शल्य कर्ण के सारथी बने क्योंकि अर्जुन के सारथी स्वयं श्रीकृष्ण थे और दुर्योधन नहीं चाहता था कि कर्ण किसी भी मामले में अर्जुन से कम हो शल्य मे ऐसे गुण थे विद्यमान थे जो एक योग्य सारथी मे होने चाहिए । दोनों के बीच युद्ध चल रहा था इसी बीच अर्जुन का एक बाण कर्ण के रथ में लगा जिससे उसका रथ कई गज पीछे चला गय

महाबली जरासंध

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                    महाभारत की कथा मे अनेकों वीर महारथियों के बारे में बताया गया है जिनमे से एक था जरासंध । उसके जन्म और मृत्यु की कथा भी बेहद ही रोचक है । जरासंध मगध का सम्राट तथा कंस का ससुर था । उसके भय से अनेक राजा अपने राज्यों को छोड़कर भाग गए थे । शिशुपाल जरासंध का सेनापति था । कथानुसार , मगध देश मे बृहद्रथ नामक राजा राज्य करते थे । उनकी दो पत्नियां थी मगर उनकी कोई संतान न थी । एक दिन राजा बृहद्रथ महात्मा चण्डकौशिक के पास गए और सेवा कर उन्हें संतुष्ट किया । प्रसन्न होकर महात्मा ने राजा को एक फल दिया और कहा कि यह फल अपनी रानी को खिला देना इससे तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी । बृहद्रथ की दो पत्नियां थी अतः उन्होंने फल को काटकर दोनो को खिला दिया । समयानुसार जब दोनों रानियों को बच्चा पैदा हुआ तो शिशु के शरीर का एक भाग एक रानी के गर्भ से तथा दूसरा हिस्सा दूसरी रानी के गर्भ से हुआ । रानियों ने घबरा कर जीवित शिशु के टुकड़ों को बाहर फेक दिया । उसी समय वहां से एक राक्षसी गुजरी जिसका नाम जरा था । जब उसने जीवित शिशु के दो टुकड़े देखा तो उसे अपनी

जनमजेय का सर्प यज्ञ

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                   जनमजेय अर्जुन के पौत्र और राजा परीक्षित के पुत्र थे । जनमजेय को जब पता चला कि मेरे पिता की मृत्यु तक्षक नाग के डसने से हुई है तो उन्होंने संपूर्ण विश्व के सर्पो को मारने के लिए नागदाह यज्ञ करवाया । विशिष्ट मंत्रोउच्चारण सेे सभी नाग खुद यज्ञ की बेदी मे आकर गिर जाते थे । जब लाखो सर्प एक साथ यज्ञ में मरना प्रारंभ हो गए तब भयभीत तक्षक नाग ने इन्द्र की शरण ली । वह इन्द्रलोक मे रहने लगा । ऋत्विको ने जब तक्षक नाग का नाम लेकर आहुति डालनी शुरू कर दी तब मजबूर होकर इन्द्र को अपने उत्तरीय में छुपाकर तक्षक नाग को जनमजेय के यज्ञ में लाना पड़ा । वहां वे तक्षक को अकेले छोडक़र स्वर्ग चले गए । इधर वासुकी नाग की प्ररेणा से आस्तीक नामक एक ब्राह्मण जनमजेय के यज्ञ स्थल में पहुंचकर ऋत्विको और यजमान की स्तुति करने लगा । विद्वान ब्राह्मण बालक आस्तीक से प्रसन्न होकर जनमजेय ने उसे एक वरदान मांगने के लिए कहा । आस्तीक ने यज्ञ को तुरंत रोकने का वर मांगा । जनमजेय ने तत्काल यज्ञ रोक दिया और तक्षक नाग भी बच गया जो बस कुछ ही क्षणों में यज्ञ कुंड में गिरने ही

एक रात के लिए जी उठे महाभारत युद्ध में मृत योद्धा

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        महाभारत के युद्ध में मारे गए सभी योद्धा जैैसे कि भीष्म पितामह , द्रोणाचार्य , दुर्योधन , कर्ण और अभिमन्यु आदि एक रात के लिए पुनर्जीवित हो गए थे । यह घटना महाभारत युद्ध के खत्म होने के 16 साल बाद की है । यह उस समय की बात है जब धृष्टराष्ट , गांधारी , कुंती , विदुर और संजय वन में रहते थे । वहां महात्मा विदुर जी के प्राण त्यागने के बाद महर्षि वेदव्यास जी आए । उन्होंने धृतराष्ट्र  गांधारी और कुंती से कहा कि आज मैं तुम्हें अपनी तपस्या का प्रभाव दिखाऊँगा । तुम सब की जो इच्छा है वह मुझसे मांग लो । तब धृतराष्ट्र और गांधारी ने अपने मरे हुए सौ पुत्रों को तथा  कुंती ने कर्ण को देखने की इच्छा जताई । महर्षि वेदव्यास ने कहा कि ऐसा ही होगा परंतु इसके लिए रात्रि तक की प्रतिक्षा करनी होगी । वेदव्यास जी के कहे अनुसार सभी गंगा तट पर गए और रात्रि होने की प्रतीक्षा करने लगे । रात्रि होने पर महर्षि वेदव्यास ने गंगा नदी में प्रवेश किया और कौरवों और पांडव पक्ष के सभी योद्धाओं का आह्वान किया । थोड़ी देर बाद सभी योद्धा प्

चक्रव्यूह रचना और अभिमन्यु का वध

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   महाभारत के युद्ध में अर्जुन पुत्र अभिमन्यु का शौर्य    कुरुक्षेत्र  में अपने प्राणों को दांव पर लगा कौरवों के महारथियों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त होने वाला वीर  अभिमन्यु अर्जुन और सुभद्रा का पुुत्र था । वह अर्जुन के समान ही शूरवीर था । अभिमन्यु ने चक्रव्यूह तोड़ना अपनी माता के गर्भ में ही सीख लिया था । एक बार जब अभिमन्यु सुभद्रा के गर्भ में ही थे तो अर्जुन अपनी पत्नी को चक्रव्यूह रचना और उसे तोड़ने के बारे में बता रहे थे पंरतु चक्रव्यूह से कैसे निकलते हैं यह बता नही सके क्योंकि सुभद्रा सो चुकी थी कौरवों-पांडवो के मध्य युद्ध के समय गुरु द्रोणाचार्य कौरवों के सेनापति थे । वे पांडवो की सेना से निरंतर पराजित होने के कारण दुखी थे । इस कारण द्रोणाचार्य ने पांडवो को पराजित करने हेतु चक्रव्यूह की रचना की । द्रोणाचार्य को पता था कि इस समय अर्जुन बहुत दुर निकल गए हैं युद्ध करते करते और चक्रव्यूह को सिर्फ अर्जुन ही तोड़ सकते हैं या फिर श्रीकृष्ण । परंतु श्रीकृष्ण ने शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा ली है । पांडवो मे चिंता की लहर दौड़ गई कि आखिर चक्रव्य

बिना शस्त्र के महाभारत युद्ध में भाग लेने वाले उडुपी नरेश

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            महाभारत युद्ध की शुरुआत से पहले आर्यावर्त के सभी राजा महाराजा इसमें भाग लेने के लिए हस्तिनापुर पहुंच रहे थे । कौरव और पांडव इन सभी को अपना लक्ष्य और प्रयोजन बताकर अपनी ओर करने के प्रयास में लगे हुए थे । तब दक्षिण भारत के उडुपी नरेश अपनी सेना लेकर इस धर्म-युद्ध मे शामिल होने के लिए हस्तिनापुर पहुंचे । कौरवों और पांडवो ने अपनी-अपनी ओर से युद्ध करने के लिए उडुपी नरेश को मनाना शुरू कर दिया । दोनों पक्षों की बातें सुनकर वह निर्णय नहीं ले पा रहे थे कि किसकी तरफ से लड़े और वहां उन्हें समस्त आर्यावर्त की सेना के भोजन की चिंता हुई । उडुपी नरेश पांडवो के शिविर में जाकर श्रीकृष्ण से मिले । उन्होंने श्रीकृष्ण से कहा कि वह भाइयों के बीच युद्ध से सहमत नहीं है परंतु इस यद्ध को अब टाला भी नहीं जा सकता है । यद्यपि वे युद्ध में भाग लेने के इच्छुक हैं परंतु अस्त्र शस्त्रों से नही । श्रीकृष्ण उडुपी नरेश का प्रयोजन समझ गए और पूछा कि तब आप क्या चाहते हैं ? उडुपी नरेश ने दोनों ओर की सेना के लिए भोजन का प्रबंध करने  का प्रस्ताव रखा । श्रीकृष्ण ने उनका प

दुर्योधन वध कथा

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यह वह समय था जब महाभारत का युद्ध अपने अंत की ओर बढ़ रहा था । कौरवों की ओर से कृतवर्मा , अश्वथामा, कृपाचार्य और दुर्योधन के अतिरिक्त कोई ओर नही बचा था । दुर्योधन अपने सभी सगे-संबंधियों को खो चुका था इस समय उसे उन सारे लोगो के उपदेश याद आने लगे जिन्होंने युद्ध से पूर्व उसे समझाया था कि यह युद्ध कितना विध्वंसकारी हो सकता है । परंतु उसने किसी की भी बात नहीं सुनी । अपनी बची-खुची सेना के समाप्त होने के बाद दुर्योधन युद्ध भूमि से भाग कर अपनी माता गांधारी के पास पहुंचा । तब माता गांधारी ने अपनी आखों की पट्टी खोलकर उसके शरीर को वज्र बनाना चाहा । गांधारी को यह वरदान प्राप्त था कि वह जिस किसी को अपनी आखों से देख लेंगी वह वज्र समान हो जाएगा । इसलिए गांधारी ने दुर्योधन से कहा कि वह गंगा स्नान करने के बाद उसके सामने नग्न अवस्था में आए । माता के कहे अनुसार दुर्योधन गंगा स्नान करने के पश्चात नग्न अवस्था में ही गांधारी के पास जाने लगा परंतु मार्ग में उसे कृष्ण मिल गए और कहने लगे कि इतने बड़े होने के पश्चात भी तुम अपनी माता के सामने इस अवस्था में जा रहे हो तुम्हें

वीर बर्बरीक

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भीम और हिडिम्बा के पुत्र का नाम घटोत्कच था । घटोत्कच और नागकन्या अहिलवती के पुत्र हुए महान योद्धा बर्बरीक । इनके जन्म से ही बर्बाकार घुुंघराले बाल थे जिसके कारण इनका नाम रखा गया बर्बरीक । बाल्यावस्था से ही बर्बरीक बहुत कुशल योद्धा और वीर थे । इन्होंने अपनी माता से युद्ध कला सीखी थी । भगवान शिव की घोर तपस्या करके इन्होंने प्रसन्न किया और तीन अभेद्य बाण प्राप्त किया । इन्हें तीन बाणधारी  नाम से भी प्रसिद्धि मिली । अग्नि देवता ने प्रसन्न होकर इन्हें धनुष प्रदान किया जो कि तीनों लोकों में विजयी बनाने के लिए पर्याप्त था । महाभारत का युद्ध कौरवों और पांडवो के बीच अपरिहार्य हो गया था  । यह समाचार बर्बरीक को पता चली तो उसके मन में भी युद्ध मे शामिल होने की इच्छा जागी । वे युद्ध में आने से पहले अपनी माता का आशीर्वाद लेने गए और उन्हें हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया । वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार अपने तीन बाण लेकर कुरुक्षेत्र की रणभूमि की ओर अग्रसर हुए । सर्वज्ञाता कृष्ण को जब यह पता चला कि बर्बरीक युद्ध के लिए निकल चुका है और अपनी माता से कमजो

विचित्रवीर्य के पुत्र

महाराज  शांतनु और सत्यवती के पुत्र विचित्रवीर्य  की दो पत्नियां थी अम्बिका और अम्बालिका । दोनों को पुत्र नहीं हो रहा था तो माता सत्यवती की आज्ञा का पालन करते हुए  वेदव्यास बोले- 'माता ! आप दोनों रानियों को मेरे सामने से  निर्वस्त्र होकर गुजरने बोलिए जिससे कि उन्हें गर्भ धारण हो  जाए ।  सत्यवती की इच्छानुसार अम्बिका जो बड़ी रानी थी पहले  वेदव्यास के पास आई परंतु वह उनके तेज को न संभाल सकी और अपने नेत्र बंद कर लिया । तत्पश्चात छोटी रानी  अम्बालिका गुजरी परंतु वह भी वेदव्यास के भय से पीली पड़ गई ।  वेदव्यास लौट कर माता सत्यवती के पास आए और उन्हें  बताया कि अम्बिका को बड़ा तेजस्वी पुत्र होगा परंतु नेत्र बंद कर लेने के कारण वह अंधा होगा और दूसरी रानी अम्बालिका को पाण्डु रोग से ग्रसित पुत्र होगा । यह सुनकर माता  सत्यवती बहुत दुखी हो गई और फिर से अम्बिका को  वेदव्यास के पास भेजा परंतु इस बार बड़ी रानी ने खुद न  जाकर अपनी दासी को ऋषि वेदव्यास के पास भेजा । दासी  बिना किसी संकोच के वेदव्यास के सामने से गुजरी ।

सहदेव जिन्होंने खाया अपने पिता का मस्तिष्क

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पाण्डु  को ऋषि किंदम ने श्राप दिया था कि जब भी वह स्त्री के साथ संबंध बनायेंगे तभी उनकी मृत्यु हो जाएगी । श्राप के कारण ही पाण्डु को अपनी कोई संतान नहीं हुई यद्यपि उनके पांच पुत्र थे । सबसे बड़े युधिष्ठिर , भीम ,  अर्जुन,  नकुल और सहदेव ।  युधिष्ठिर अर्जुन और भीम  माता कुुंती की  संतानें थी और नकुल और सहदेव का जन्म मान्द्री से हुआ था कुंती को ऋषि दुर्वासा ने एक मंत्र दिया था कि वह जिस भी  देवता का आह्वान करके उनसे पुत्र की इच्छा रखेगी उस देवता से उन्हें पुत्र की प्राप्ति होगी । जिसके फलस्वरूप कुंती और मान्द्री दोनों को पुत्र प्राप्ति हुई और पाण्डु धर्म पिता बनें । पाण्डु  ने तप के बल पर बहुत ज्ञान हासिल किया था । उन्हें  भूत भविष्य और वर्तमान में जो हुआ और होगा सब की  जानकारी थी । उन्हें ज्योतिषी आदि का भी ज्ञान प्राप्त था । और वह अपना ज्ञान अपने पांचो पुत्रों को देना चाहते थे परंतु उन्हें समझ नहीं आया कि यह ज्ञान उन्हें कैसे दे । एक बार पाण्डु ने अपने पांचो पुत्रों को बुलाया और कहा कि जब उनकी मृत्यु हो जाएगी तो

भीष्म पितामह के पांच चमत्कारी तीर

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            महाभारत का युद्ध  चल रहा था और गंगा पुत्र भीष्म  पितामह कौरवों की तरफ से युद्ध कर रहे थे । दुर्योधन  युद्ध के परिणाम सोचकर बहुत चिंतित था ।उसे लगता था कि अगर पितामह चाहते तो यह युद्ध एक दिन में खत्म कर सकतें थे परंतु वे इस युद्ध में पांडवो को नुकसान पहुंचाना ही नहीं चाहते हैं । कौरवों की ओर से युद्ध करना उनकी मजबूरी है  मन से तो वे पांडवो को ही चाहते हैं । दुर्योधन सायं काल में युद्ध विराम होने के बाद भीष्म पितामह के पास पहुंचा और उन्हें पांडवो का हितैषी कहा । पितामह से बोला -' आप इस युद्ध में प्रकट रूप से भले ही कौरवों के साथ है परंतु आप नहीं चाहते कि कौरवों की विजय हो'। पितामह बोले - 'यह तुम क्या कह रहे हो दुर्योधन । ऐसा  कहकर तुमने मुझपर गंभीर आरोप लगाए हैं ।' दुर्योधन बोला - 'यह सच है पितामह । अगर आप चाहते तो  कौरव सेना यह युद्ध कब का जीत चुकी होती । आपने अभी  तक किसी भयंकर अस्त्र का प्रयोग नहीं किया हैं।' पितामह बोले -'ठीक है ! कल मैं पांच चमत्कारी तीरों का

किन्नरों के देवता इरावन

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                      अर्जुन और उलूपी के पुत्र का नाम  इरावन था ।  दक्षिण भारत के तमिलनाडु में इरावन की देवता की तरह पूजा की जाती है विशेषकर किन्नर समाज में एक खास दिन सारे किन्नर इकठ्ठे होकर इरावन से सामुहिक विवाह करते हैं और अगले दिन उन्हें मृत मानकर एक विधवा की तरह विलाप करते हैं । महाभारत के कथनानुसार, महाभारत युद्ध के समय सहदेव जिन्हें त्रिकाल दृष्टि प्राप्त थी ने इरावन को बता दिया था कि अगले दिन उनकी युद्ध में मृत्यु हो जाएगी । अपनी मृत्यु की बात सुनकर भी इरावन नहीं घबराएं तत्पश्चात उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से जाकर विनती की कि वे अविवाहित नहीं मरना चाहते । इतने कम समय में किसी कन्या से इरावन का विवाह कैसे हो सकता था और इसलिए श्रीकृष्ण ने मोहिनी रूप धारण कर इरावन से विवाह किया । अगले दिन युद्ध का आठवां दिन था चूंकि भीष्म पितामह प्रतिज्ञा कर चुके थे कि वे किसी पांडव और उसके पुत्रों का वध नहीं करेंगे और इरावन की मायावी शक्तियों के आगे किसी की नहीं चल रही थी इसलिए मजबूर होकर दुर्योधन को मायावी राक्षस अलम्बुष की मदद लेनी पड़ी जिसने इरावन

अर्जुन और उलूपी

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द्रौपदी  का विवाह पांच पांडव भाइयों से हुुुआ था और नियमानुसार वह एक वर्ष एक ही पति के साथ रहती थी और इस अवधि में किसी और पांडव भाइयों को उसके कक्ष में आने की अनुमति नहीं थी । अर्जुन की द्रौपदी के साथ रहने की अवधि अभी-अभी खत्म हुई थी और युधिष्ठिर की अवधि शुरू हुई।  ऐसे में एक बार अर्जुन अपने अस्त्र-शस्त्र द्रौपदी के कक्ष में ही भुल गए और उन्हें तत्काल उसकी जरूरत पड़ी एक ब्राह्मण की रक्षा के लिए मजबूरी में अर्जुन को द्रौपदी के कक्ष में जाना पड़ा जहां युधिष्ठिर और द्रौपदी अकेले थे । नियमानुसार अर्जुन को एक वर्ष के लिए राज्य छोड़कर जाना पड़ा । इस एक वर्ष के वनवास के समय अर्जुन तीर्थाटन करते हुए हरिद्वार के पास गंगा पहुंचे । जहां नागकन्या उलूपी से उनका साक्षात्कार हुआ । उलूपी ऐरावत वंश के कौरव्य नामक नाग राजा की पुत्री थी ।   नागकन्या का विवाह एक बाग से हुआ था जिसे गरूड़ ने मार दिया था । अर्जुन को देखते ही वह उसपर मुग्ध हो गई और उसे अपने साथ पाताल लोक ले गई और उससे विवाह का प्रस्ताव रखा । अर्जुन एक वर्ष तक नाग लोक में उलूपी के साथ रहे । दोनों को एक पु

धृतराष्ट्र के पुत्र युयुत्सु

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    महाभारत काल में धृतराष्ट्र चाहते थे कि उन्हेंं पाण्डु से पहले संतान की प्राप्ति हो । गांधारी ॠषि वेदव्यास के वरदान  के बाद गर्भवती हो तो गई थी परंतु इनका गर्भकाल बहुत लंबा हो गया । जिसके कारण पाण्डु के घर में पुत्र का जन्म हुआ । दुसरी ओर धृतराष्ट्र पुत्र पाने की चाहत में व्याकुल हुए जा रहे थे और इस कारण उन्होंने गांधारी की सेवा में नियुक्त एक दासी से संबध बना लिया जिसके फलस्वरूप एक पुत्र का जन्म हुआ । धृतराष्ट्र और दासी का यह पुत्र युयुत्सु के नाम से जाना गया । वही गांधारी दो वर्ष तक गर्भवती रही और उन्हें संतान प्राप्ति नहीं हुई । क्रोध में आकर एक बार गांधारी ने अपने गर्भ में एक मुक्का मारा और गर्भ गिरा दिया । उसी समय यह बात वेदव्यास को पता चलीं और वे तुरंत वहां आकर गांधारी से बोले -'गांधारी यह तूने अच्छा नहीं किया । मेरा वरदान कभी खाली नही जा सकता । तू सौ कुण्ड बनवा और उसे घी से भर ।' तत्काल वेदव्यास जी के आज्ञानुसार सौ कुण्ड बनवाए गए और उसे घी से भरा गया । वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़क

दुर्योधन की पत्नी भानुमति

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द्वापर युग  में कम्बोज के राजा चन्द्रवर्मा की पुत्री भानुमति  के स्वयंवर का आयोजन किया गया । भानुमति स्वर्ग की अप्सराओं से भी ज्यादा सुंदर थी । इस स्वयवर मे दुर्योधन, कर्ण , जरासंध , शिशुपाल जैसे पराक्रमी राजा भानुमति से विवाह करने की इच्छा लेकर आए थे । जब भानुमति स्वयंवर स्थल पर पूरे साज-श्रृंगार के साथ आई तो सभी राजा राजकुमारों के मुंह खुले के खुले रह गए । ऐसा अप्रतिम सौंदर्य किसी ने नहीं देखा था ।                       जब दुर्योधन ने भानुमति को देखा तो उसका मन मचल उठा और उसने उससे विवाह करने की ठान ली । भानुमति वरमाला लेकर चली । सभी राजाओं के बारे में जानती और आगे बढ़ जाती। जब दुर्योधन के पास पहुंची तो थोड़ी देर वहां रूक कर आगे बढ़ने लगी  । दुर्योधन को लगा कि भानुमति उसे ही अपना वर चुनकर वरमाला डालेगी परंतु ऐसा नहीं हुआ तब दुर्योधन ने जबरदस्ती भानुमति के हाथ से अपने गले में वरमाला डालवा लिया ।                             स्वयंवर में उपस्थित सभी राजाओं ने इसका विरोध किया तब दुर्योधन ने चुनौती दे डाली कि उन्हें उससे पहले कर्ण का सामना करना पडेगा