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संपूर्ण सिंहासन बत्तीसी / Sinhasan Battisi All stories

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सिंहासन बत्तीसी की सभी बत्तीस कहानियाँ  Sinhasan Battisi All stories सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ बहुत ही लोकप्रिय है । महान सम्राट विक्रमादित्य के जीवन से जुड़ी यह कहानीयां बहुत ही रोचक और प्रेरणादायक है । यहां सिंहासन बत्तीसी की कहानियों को एक ही जगह पर एकत्रित करने का प्रयास किया है ।  1.  विक्रमादित्य के जन्म और पहली पुतली रत्नमंजरी की कहानी   2.  दूसरी पुतली चित्रलेखा की कहानी 3.  तीसरी पुतली चन्द्रकला की कहानी 4 .  चौथी पुतली कामकंदला की कहानी 5 .  पांचवी पुतली लीलावती की कहानी 6 .  छठी पुतली रविभामा की कहानी 7 .  सातवीं पुतली कोमुदी की कहानी 8 .  आठवीं पुतली पुष्पावती की कहानी   9 .  नौंवी पुतली मधुमालती की कहानी 10.  दसवीं पुतली प्रभावती की कहानी 11.  ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचना की कहानी 12 .  बारहवीं पुतली पद्मावती की कहानी 13 .  तेरहवीं पुतली कीर्तिमति की कहानी 14.  चौदहवीं पुतली सुनयना की कहानी 15.  पन्द्रहवीं पुतली सुन्दरवती की कहानी 16.  सोलहवीं पुतली सत्यवती की कहानी 17.  सत्रहवीं पुतली विद्यावती की कहानी 18.  अठारहवीं पुतली तारावती की कहानी 19 .  उन्नीसवीं पुतली रूपरेखा की

पोरव राष्ट्र / Pourav Rastra

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पोरव राष्ट्र झेलम नदी केे किनारे बसा था । पोरव राष्ट्र का मुख्य रंग नीला था इसलिये इस राज्य को नीला सदन भी कहा जाता था । यहां के घरों का रंग नीला था । यहांं के सैनिक भी नीली वरदी पहनते थे । राज्य का हर एक व्यक्ति नीले कपडे पहनता था।  वैसे तो पोरव राष्ट्र पर अनेकों राजा- महाराजाओं ने राज्य किया पंरतु मुख्य थे - राजा पुरू , राजा भरत , राजा पौरव राजा बमनी , राजा पोरस , राजा मलयकेतु व भद्रकेतु ।  पोरव राष्ट्र के राजाओं के राजपरिवार को पौरव राजपरिवार कहा जाता था । पोरव राष्ट्र का इतिहास काफी लोकप्रिय है । राजा बमनी और उनके पुत्र राजा पोरस को भारत के बहादुर राजाओं में गिना जाता है । पोरव राष्ट्र के इतिहास में बहादुरी और उसकी कहानियाँ झेलम की लड़ाई के बाद से अच्छी तरह से उल्लेखित की गई है । यही राजा पोरस ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लडाई लड़ी । झेलम का यह युद्ध हाईडेस्पीज युद्ध के नाम से प्रसिद्ध हैै ।  राजा भरत जिनके नाम पर भारतवर्ष का नाम दिया गया था । ऐसा कहा जाता है कि ऋग्वेद में उल्लेख किया गया है कि राजा पोरस केे पूर्वज पुरू जनजाति के समान थे तो इसकेे अनुसार राजा भरत इनके पूर्वज हुए

वीर दुर्गादास राठौड़

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                        राजपूताने मे बड़़े - बड़े शूरवीर हुुए । उस मरुभूमि ने कितने ही नर रत्नों को जन्म दिया लेकिन वीर दुर्गादास राठौड़ जी अपने अनुपम आत्म-त्याग अपनी निस्वार्थ सेवा-भक्ति और अपने उज्जवल चरित्र के लिए कोहिनूर के समान है । दुर्गादास जी मारवाड़ के शासक महाराजा जसवंत सिंह के मंत्री आसकरण राठौड़ के पुत्र थे । दुर्गादास जी का लालन- पालन उनकी माता ने उनके पिता से दूर लुनावा नाम के गांव मे की । लेकिन अपने पिता की भांति ही उनमें भी अदम्य साहस था । एक बार कि बात है , जोधपुर राज्य की सेना के ऊटो को चराते हुए कुछ ऊट दुर्गादास जी के खेत में घुस गए । बालक दुर्गादास के विरोध करने पर भी चरवाहों ने ध्यान नही दिया तो उनका खून खौल उठा और उन्होंने अपनी तलवार झट से निकाल कर ऊंट की गर्दन उड़ा दिया । इस वाक़ये की खबर जब महाराजा जसवंत सिंह को मिली तो वे उस साहसी बालक से मिलने के लिए उतावले हो उठे और अपने सैनिकों को उन्हें दरबार में लाने का हुक्म दिया । सभा में आसकरण जी ने अपने पुत्र को इतनी निर्भीकता से अपना अपराध स्वीकारते हुए देखा तो सकपका गए परंतु

औरंगजेब और जैनाबाई

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                    सन् 1636 ई की बात है जब औरंगजेब दक्कन का  गवर्नर बनके बुरहानपुर पहुंचा तो वहां उसकी मुलाकात हीराबाई से हुई । हीराबाई से औरंगजेब की पहली मुलाकात शाहजहाँ के साढ़ू और खानदेश के हाकिम सैफ खान के महल में हुई । हीराबाई के अद्भुत सौंदर्य को देखते ही औरंगजेब वही गश खाकर गिर पड़ा जब उसकी आंख खुली तो उसका सर हीराबाई के गोद में था । औरंगजेब उसी वक्त से हीराबाई का होकर रह गया । हीराबाई सैफ खान की कनिज और नर्तकी थी । उसे संगीत मे महारथ हासिल थी । उसकी आवाज बहुत मीठी थी।  रूप लावण्य जवानी की तो वह मल्लिका थी । विस्मित कर देने वाली सुंदरता थी हीराबाई की जिससे औरंगजेब जैसे क्रूर बादशाह को भी अपने वश मे कर लिया । औरंगजेब उसके बिना एक पल नहीं रह पाता था। यहां तक कि उसने अपने कामकाज में भी लापरवाही बरतनी शुरू कर दी । एक बार कि बात है, औरंगजेब हीराबाई के साथ था और दोनों प्रेम भरी बातें कर रहे थे । तभी औरंगजेब ने कहा कि वह बादशाह बनेगा तो उसे मल्लिका के पद पर बिठाएगा । हीराबाई के लिए कुछ भी क़ुर्बान कर सकता है और वह जो भी मांगेगी उसकी इच्छा

जब अलाउद्दीन खिलजी की बेटी को प्यार हुआ एक राजपूत राजकुमार से

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                  यह कहानी उस समय की है जब अलाउद्दीन खिलजी की सेेना गुजरात के सोमनाथ मंदिर   को खंडित करकेे शिवलिंग को अपने साथ दिल्ली ले जा रही थी तभी जालौर के शासक कान्हड़ देव चौहान ने शिवलिंग को पाने के लिए खिलजी की सेना पर आक्रमण कर दिया । इस हमले  में अलाउद्दीन की सेना को हार का सामना करना पड़ा और अपनी जीत के बाद कान्हड़ देव चौहान ने शिवलिंग को जालौर मे स्थापित कर दिया । जब अलाउद्दीन खिलजी को अपनी सेना की हार के बारें में पता चला तो उसने कान्हड़ देव के पुत्र और इस युद्ध के प्रमुख योद्धा विरमदेव  को दिल्ली बुुलाया । दिल्ली पहुचने के बाद विरमदेव को शहजादी फीरोजा देखती है और उसे देखते ही राजकुमार से प्यार हो जाता है । शहजादी ने अपने पिता अलाउद्दीन को कहा कि वह मन से विरमदेव को चाहती है और अगर शादी करेंगी तो बस उसी से नही तो आजीवन अक्षत  कुंवारी रहेगी । अलाउद्दीन को अपनी प्यारी बेटी के जिद्द के आगे झुकना पड़ा फिर उसने सोचा कि हार का बदला और राजनीतिक फायदा एक साथ उठाया जाएगा । अलाउद्दीन खिलजी ने तब विरमदेव के पास इस शादी का प्रस्ताव रखा जिस

मुमताज और शाहजहाँ की अमर प्रेम कहानी

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                  मुमताज महल मुगल बादशाह शाहजहाँ  की प्रिय बेेेगम का जन्म 1593 मे आगरा शहर में अर्जुमंद बानो बेगम के नाम से हुआ था मुमताज महल की उपाधि बाद में शाहजहाँ ने दी । मुमताज महल आसफ खां  की पुत्री थी जो कि बादशाह जहाँगीर के वज़ीर हुआ करते थे । नूरजहाँ जहाँगीर की खास बेगम मुमताज की बुआ थी ।  मुमताज उर्फ अर्जुमंद बानो बहुत खुबसूरत थी और मुगल हरम से जुड़े मीना बाजार में कांच और रेशम के मोती बेचा  करती थी । वही 1607 में अर्जुमंद बानो को शाहजहाँ ने  अपना सामान बेचते हुए देखा था । उसकी उम्र महज 14 साल की थी । जब वह जाने लगीं तो शहजादे खुर्रम (शाहजहाँ) ने उसका पीछा किया कुछ ही देर में शहजादे को पता चला  कि उसका नाम अर्जुमंद बानो है और वह वज़ीर आसफ खां की लडकी है । धीरे धीरे उन दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा और फिर बादशाह जहाँगीर के इजाजत से खुर्रम और अर्जुमंद बानो की सगाई हो गई साथ ही साथ खुर्रम को अगला होने वाला बादशाह भी घोषित कर गया । लेकिन नूरजहाँ चाहती थी कि खुर्रम का निकाह उसकी और शेर अफगान की बेटी लाडली

बेहद दर्दनाक थी मुमताज की मौत

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                      मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने जिस मुमताज के लिए सातवें अजूबों में से एक ताजमहल बनवा दिया उस मुमताज की मौत बहुत दर्दनाक थी । अपने चौंदहवे बच्चे को जन्म देने के समय 30 घंटे की प्रसव पीड़ा झेलते हुए उनकी मौत हो गई थी । शाहजहाँ अपनी बेगम मुमताज से बेहद मुहब्बत करता था और उसे छोड़कर कहीं दूर नहीं जाता था । एक बार डेक्कन मे खान जहां लोदी के विद्रोह को दबाने के लिए शाहजहाँ को बुरहानपुर जाना था । उस समय मुमताज नौ महीने की गर्भवती थी लेकिन फिर भी शाहजहाँ उसे आगरा से 787 किलोमीटर दूर धौलपुर , ग्वालियर से होता हुआ बुरहानपुर ले गया । गर्भावस्था का नौवां महीना और इतनी लंबी यात्रा मुमताज बुरी तरह से थक गई और इसका असर उसके गर्भ पर भी हुआ । मुमताज को दिक्कत होनी शुरू हो गई । मुमताज प्रसव पीड़ा के कारण तड़प रही थी दूसरी तरफ शाहजहाँ विद्रोह को दबाने के लिए रणनीति बना रहा था । दासियाँ आकर पल-पल का ब्यौरा दे रहीं थीं । उसे मुमताज की खराब हालत की सूचना मिली लेकिन उसने दासियों को जाने का आदेश दिया । वह मंगलवार की सुबह से बुधवार की आधी रात तक द

संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी

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कन्नौज की राजकुमारी संयोगिता दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान से मन-ही-मन में प्रेम करती थी । राजकुमारी  पृृथ्वीराज के बहादुरी के किस्से बचपन से ही सुनती आ रही थी । धीरे-धीरे जब वह एक छोटी बालिका से एक युवती के रूप में परिवर्तित हो गई तो उसका यह आकर्षण प्रेेेम में परिवर्तित हो गया ।  राजकुमारी ने पृथ्वीराज को कभी एक युवक के रूप में नहीं देखा था इसलिए वे पृथ्वीराज का समाचार या उनकी तस्वीर  दिखाने वाले को बहुत इनाम दिया करती थी । वह सदैव ही राजा पृथ्वीराज के विषय में जानने को तत्पर रहती थी । उनकी बहादुरी की  नईं नई बाते सुनने के लिए प्रतीक्षा करती थी । चित्रकार पन्नाराय राजकुमारी संयोगिता को पृथ्वीराज के अलग-अलग चित्र दिखाया करते थे । एक बार उन्होंने पृथ्वीराज चौहान का जंगल में शिकार करते समय का चित्र दिखाया जिसे देखकर राजकुमारी अपने प्रेम पर मंत्रमुग्ध होकर उस चित्र पर हाथ फेेेरने लगीं । पन्नाराय ने उसी समय राजकुमारी संयोगिता का एक चित्र बनाया जिसमें वह अप्रतिम सुंदरी लग रही थी । उस चित्र को लेकर पन्नाराय दिल्ली पृथ्वीराज चौहान के पास पहुंचे और संयोगिता का संदेश और चित्र उन्हें दिया ।

रानी लक्ष्मीबाई का बचपन

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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई  के बचपन का नाम मणिकर्णिका था इसलिए सभी उन्हें प्यार से मनु कहा करते थे। बचपन में ही मनु की माता चल बसी थी इसलिए उनके पिता मोरोपंत  ने नन्हीं बालिका को बड़े ही लाड-प्यार से पाला था। चूूंकि वे मराठा पेशवा बाजीराव द्वितीय  की सेवा में थे इसलिए अपने साथ वे मनु को भी दरबार मेंं ले जाया करतेे थे क्योंकि उतनी छोटी बच्ची को वे अकेले नहींं छोड़ना चाहते थे । दरबार में मनु अपनी सुंदरता और चंचलता के कारण सबकी प्रिय बन गई थी और पेशवा तो प्यार से मनु को "छबीली" कहा करते थे । मनु को बचपन से ही अस्त्र-शस्त्रों और घुड़सवारी का शौक था और चूंकि वह अपने पिता के साथ दरबार आया जाया करती थी इसलिए उसे तलवारबाजी और घुड़सवारी सिखने का मौका भी मिला। वैसे भी अन्य बालिकाओं के मुकाबले मनु को ज्यादा स्वतंत्रता मिली हुई थी । बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र नाना साहब मनु के बचपन के साथी हुआ करते थे  । एक बार नाना साहब हाथी की सवारी करने निकले जब मनु ने उन्हें देखा तो वह भी हाथी की सवारी करने के लिए मचल उठी और नाना साहब से कहा कि वह भी उनके साथ हाथी पर चढ़ना चाहती है लेक

चाणक्य और चन्द्रगुप्त भाग-3

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चन्द्रगुप्त की शिक्षा तक्षशिला विश्वविद्यालय में आचार्य चाणक्य की देखरेख में पूर्ण हुई । उन्होंने चन्द्रगुप्त को हर विपत्ति से लड़ने के लिए तैयार किया क्योंकि उनका लक्ष्य आसान नहीं था । मगध जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को जीतना कोई बच्चों का खेल न था । मगध का राजा घनानंद नीच जन्मा और क्रूरता से भरा हुआ था इसलिए उसके राज्य की प्रजा में असंतोष व्याप्त था । वह अत्यधिक धन का लोभी था इसलिए उसने अपने राज्य में करों को भी बढ़ा दिया था । यहां तक कि वह मुर्दा जलाने के लिए भी कर वसूली करता था । उसे अपने राज्य के सुरक्षा की कोई चिंता नहीं थी ,सारा भार उसके अमात्य प्रमुख ' मुद्राराक्षस ' पर था ।                               पोरव राष्ट्र के राजा पोरस से सिकंदर का भयंकर युद्ध हुआ परंतु दोनों को अंतिम में संधि करनी पड़ी। जब सिकंदर अपनी सेना के साथ व्यास नदी पार कर मगध पर आक्रमण करना चाहता था तो आचार्य चाणक्य ने अपने शिष्य चन्द्रगुप्त की मदद से सिकंदर की सेना में बहुत भ्रम फैलाया। चन्द्रगुप्त ने ग्रीक छावनी में जाकर उनके राष्ट्र ध्वज को जला दिया जिससे सैनिकों के मन में डर पैदा हो गया क्योंक

चाणक्य और चन्द्रगुप्त भाग-2

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घनानंद द्वारा अपमानित किए जाने पर आचार्य चाणक्य ने अखंड प्रतिज्ञा की कि वे संपूर्ण 'नंद वंश ' का सर्वनाश कर देेंगे और मगध को एक सुुुयोग्य शासक के हाथों सौंपेंगे जो सारे भारतवर्ष को एक सूत्र में बांधकर रखेगा और वक्त आने पर अपने देश की रक्षा विदेशी आक्रमणकर्ताओ से करेगा । आचार्य चाणक्य की खोज 'चन्द्रगुप्त मौर्य '  पर खत्म हुुुई ।                                  नंद के दरबार से अपमानित होने के बाद चाणक्य कुछ समय पाटलिपुत्र में ही रहे।  एक बार जब वे एक स्थान से गुज़र रहे थे तो उन्होंने एक तीक्ष्ण बुद्धि वाले बालक को देखा जो खेल -खेल में राजा बना हुआ था । बाकी सारे बालक उसकी प्रजा का अभिनय कर रहे थे । वह छोटा बालक इतनी सूझ बूझ वाला था कि आचार्य उसकी प्रतिभा देखते ही पहचान गए और उसके पास जाकर उसका नाम तथा माता-पिता के बारे में पूछा । बालक ने बडी विनम्रता के साथ जवाब दिया  - ब्राहमण देव! मेरा नाम चन्द्रगुप्त है और मेरी माता का नाम मुरा हैं।  मैं अपने मामा और अपनी माता के साथ पास के कबीले में रहता हूँ । मेरे पिता राजा घनानंद की सेना में थे और युद्ध मे मारे गए

चाणक्य और चन्द्रगुप्त भाग -1

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326ईसा पूर्व में सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया। उस समय भारत छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था। किसी राजा मे इतना सामर्थ्य न था कि वह अकेला सिकंदर की सेना को टक्कर दे सकें । भारत के सभी छोटे राज्यों के राजा आपस में शत्रुता का भाव रखते थे। सभी अपनी-अपनी सीमाएं बढ़ाना चाहते थे किसी में एकता की भावना न थी और न कोई संपूर्ण भारत को ही अपना देश समझता था ।                              जब सिकंदर ने भारतवर्ष पर आक्रमण किया तो तक्षशिला का राजा आम्भिक डर गया और बिना युद्ध किए ही सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली और उसकी हर प्रकार से सहायता करने लगा। उस समय तक्षशिला विद्या और कला की नगरी हुआ करती थी । तक्षशिला विश्वविद्यालय में दूर -दूर से विद्यार्थी ज्ञानार्जन के लिए आया करते थे। विश्वविद्यालय में एक से एक शिक्षक थे जिनमें से एक महान शिक्षक और व्यक्तित्व का नाम था 'आचार्य चाणक्य '  । चाणक्य तक्षशिला विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के शिक्षक और विचारक थे । उन्हें तक्षशिला नरेश आम्भिक का इस प्रकार बिना युद्ध लड़े किसी विदेशी आक्रमणकर्ता की अधीनता स्वीकार कर लेना अच्छा नहीं लगा । उन्होंने आम्भिक

विक्रमादित्य का सिंहासन और राजा भोज

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प्राचीन काल में लगभग 1010 से 1055 ईसा की बात है, तब अति प्रसिद्ध उज्जयिनी नगरी में परमारवंशीय राजा राजा भोज का शासन था । राजा भोज अपनी न्याय प्रियता और कुशल शासन के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने उज्जयिनी की जगह धार को अपनी नई राजधानी बनाया था । उनके कार्यों के वजह से उन्हें 'नव विक्रमादित्य '  भी कहा जाता है।                                        उनकी नगरी में एक ऊँचा टीला था जिसपर बैठकर एक बालक बड़ी चतुराई से न्याय करता था । एक बार कि बात है, राजा भोज उस टीले के पास से गुज़र रहे थे, तब भी वह बालक वहां बैठकर अपने मित्रों के झगड़े का समाधान बड़ी गंभीरता के साथ कर रहा था। उसने ऐसे चतुराई के साथ न्याय किया कि राजा देखकर आश्चर्यचकित हो गए । एक छोटा बच्चा कैसे इतनी सहजता से उचित न्याय कर सकता है । राजा भोज अपने राजमहल पहुंचे और दरबार के विद्वानों और ज्योतिषियों को यह अनोखी बात बताई । उन्होंने अपनी विद्या से इस बात का पता लगाया कि उस टीले के नीचे राजा विक्रमादित्य का सिंहासन दबा हुआ है । वह देवताओं द्वारा बना सिंहासन है इसलिए उसपर बैठने वाला व्यक्ति हमेशा सच्चा न्याय करता है ।