पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय | prithviraj chahuhan's biography in hindi

पृथ्वीराज चौहान का जीवन परिचय | Prithviraj Chahuhan's biography in hindi


पृथ्वीराज तृतीय जिन्हें पृथ्वीराज चौहान के नाम से जाना जाता है , चौहान वंश के राजा तथा भारतवर्ष के सबसे प्रसिद्ध राजाओं में एक थे । वे अंतिम हिन्दू सम्राट थे जिन्होंने दिल्ली की गद्दी पर राज किया । उनकी राजधानी अजमेर थी । पृथ्वीराज चौहान का जन्म अजमेर के राजा सोमेश्वर चौहान और माता कर्पूरदेवी के घर हुआ । सोमेश्वर चौहान की मृत्यु 1177 ईसवीं में हुई थी उस समय पृथ्वीराज चौहान मात्र 11 वर्ष के थे । पृथ्वी राज जो उस समय नाबालिग थे अपनी माता के साथ गद्दी पर बैठे।  उनका शासनकाल 1178 ईसवीं से 1192 ईसवीं तक का था। पृथ्वीराज चौहान को राय पिथौरा भी कहा जाता है।  वेे बचपन से ही एक कुुुशल योद्धा थे । उन्होंने अपने बाल्यकाल में ही शब्दभेदी बाण का अभ्यास किया था। वेे अश्व और हाथी नियंत्रण विद्या में भी माहिर थे । 

पृथ्वीराज चौहान की फोटो
Prithviraj chahuhan's biography



पृथ्वीराज चौहान का जन्म ( Birth of prithviraj chahuhan)

राजा सोमेश्वर चौहान और माता कर्पूर देवी को बारह वर्ष के लंबे इंतजार के बाद बेटे पृथ्वीराज को गोद में लेने का सौभाग्य मिला।  पृथ्वीराज का जन्म 1168 ईसवीं में हुआ । राज्य में उनके काफी दुश्मन थे जो हर पल घात लगाकर बैठे थे परंतु पृथ्वीराज चौहान भाग्यशाली थे । हर बार उनके दुश्मनों का षडयंत्र विफल हो जाता था । मात्र ग्यारह वर्ष की छोटी आयु में उनके सर से पिता का साया उठ गया और उन्हें राज्य की बागडोर अपने हाथों में संभालनी पड़ी । उनके बचपन की वीरता की काफी कहानियाँ सुनने को मिलती है । वे एक अच्छे राजा सिद्ध हुए और अपने दुश्मन राजाओं से लोहा मनवाया । पृथ्वीराज चौहान के बचपन के मित्र चन्द्रबरदाई एक महान कवि थे जिन्होंने पृथ्वीराज चौहान के जीवन की घटनाओं का अपने पुस्तक पृथ्वीराजरासो में लिखा है । 


दिल्ली के राजा अनंगपाल पृथ्वीराज चौहान के नाना थे और उन्होंने पृथ्वीराज चौहान की वीरता की काफी कहानियाँ सुनी अतः उन्होंने अपने दामाद सोमेश्वर चौहान और अपनी बेटी के सामने पृथ्वीराज को अपना वारिस बनाने की बात कही । मात्र 13 वर्ष की छोटी आयु में उन्होंने गुजरात के पराक्रमी शासक भीमदेव को हरा दिया था । युवा पृथ्वीराज ने आरंभ में ही राज्य विस्तार की नीति अपनाई । पहले अपने सगे-संबंधियों के विरोध को समाप्त कर उसने राजस्थान के कई इलाकों को अपने कब्जे में कर लिया।  फिर उसने बुदेलखंड पर चढाई की और महोबा के निकट एक युद्ध में चंदेलों को पराजित किया । इसी युद्ध में प्रसिद्ध भाईयों आल्हा और ऊदल ने महोबा को बचाने के लिए अपनी जान दी थी । पृथ्वीराज ने उनके राज्य को जीतने के बाद भी नही हडपा था।   वे अनेक भाषाओं और विषयों के ज्ञाता थे । राजा अनंगपाल के बाद राजा पृथ्वीराज चौहान ने ही दिल्ली की गद्दी संभाली । दिल्ली की गद्दी पर विराजने के बाद ही पृथ्वीराज चौहान ने किला राय पिथौरा का निर्माण करवाया था । किला राय पिथौरा कुतुब मीनार परिसर सहित वर्तमान दिल्ली में एक किलेबंद परिसर है । 


पृथ्वीराज चौहान की सेना (Prithviraj chahuhan ki sena ) -


पृथ्वीराज चौहान की सेना पृथ्वीराज चौहान की ही तरह बलवान थी । इतिहासकारों के अनुसार उनकी सेना में 300 हाथी  तथा 3,00,000 सैनिक थे , जिनमें बड़ी संख्या में घुड़सवार थे।  


पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की प्रेम कहानी ( Prithviraj chahuhan and sanyogita's love story)

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता की फोटो


कन्नौज के राजा जयचन्द की पुत्री संयोगिता और पृथ्वीराज चौहान की प्रेम कहानी को भला कौन नहीं जानता ।  संयोगिता को पृथ्वीराज चौहान की तस्वीर एक चित्रकार ने दिखाई थी । दूूसरी ओर वही उसने राजकुमारी संयोगिता की तस्वीर दिल्ली के सम्राट पृथ्वीराज चौहान को भी दिखाई थी । वे दोनों एक दूसरे की तस्वीर देखकर ही प्रेम करने लगे थे।  संयोगिता पृथ्वीराज की वीरता पर मर मिटी थी दूूसरी ओर पृथ्वीराज चौहान भी संयोगिता के बिना चैैैन से नहीं रह पा रहे थे । चूंकि राजा जयचन्द पृृृथ्वीराज को अपना शत्रु मानते थे इसलिए पृथ्वीराज चौहान से अपनी पुुत्री के विवाह के बारे में वह सोच भी नही सकते थे।  राजा जयचन्द को जब अपनी पुत्री के प्रेेेम के बारे में पता चला तो उन्होंने एक स्वयंवर का आयोजन किया जिसमें सभी राजाओं को बुलाया बस पृथ्वीराज चौहान को छोड़कर । वह इस बहाने पृथ्वीराज को नीचा भी दिखाना चाहता था इसलिए उसने स्वयंवर के द्वार पर दरबान केे रूप मेंं पृृृथ्वीराज चौहान की एक मूूर्ति खड़ी कर  दी ।  राजकुमारी संयोगिता पृथ्वीराज चौहान को ही अपना सब कुछ मान चुुुकी थी अतः दुुुुखी मन सेे उसने पृृृथ्वीराज की मूूर्ति पर ही वरमाला डालने का निर्णय किया और वह आगे बढीं परंतु जैसे ही उसने मूर्ति में माला डालनी चाही उसी समय पृृृथ्वीराज चौहान वहां आ पहुंचे और वरमाला राजकुमारी संयोगिता ने उनके गले में डाल दिया। तत्पश्चात पृथ्वीराज चौहान तुुंरत संयोगिता को अपने घोड़े मेें बिठाकर हवा की गति से वहां से निकल पड़ेे । दिल्ली पहुंचकर वहां दोनों नेे गंंधर्व विवाह किया । और इस तरह दोनों की प्रेम कहानी एक मिशाल बन गई । 


पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गोरी -


सन् 1191 ईसवीं में पृथ्वीराज चौहान और सुल्तान मोहम्मद गोरी के बीच पहला युद्ध तराईन के मैदान में हुआ था । इस युद्ध में सुल्तान की बुरी तरह से हार हुई थी । ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान ने सुल्तान मोहम्मद गोरी को 17 बार युद्ध में पराजित किया और बार बार उसे अपनी दरियादिली के चलते छोड़ दिया ।  उधर कन्नौज का राजा जयचन्द पृथ्वीराज चौहान का और बड़ा शत्रु बन बैठा था जबसे संयोगिता से उसने भगाकर विवाह किया था । कहते हैं कि उसने पहले तो सभी राजाओं को उसके खिलाफ भडकाया इसके बाद सुल्तान मोहम्मद गोरी का साथ दिया पृथ्वीराज चौहान के खिलाफ । इस प्रकार सन् 1192 ईसवीं के दूसरे तराईन के युद्ध में पृथ्वीराज चौहान को मोहम्मद गोरी ने बुरी तरह पराजित किया और उन्हें और उनके मित्र चन्द्रबरदाई को कैद कर अपने मुल्क ले गया । वहां उसने उनकी दोनों आँखे गर्म सलाखों से फ़ोड़ डाली । 


पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु ( Prithviraj Chahuhan's death ) -


सुल्तान मोहम्मद गोरी पृथ्वीराज चौहान और चन्द्रबरदाई और कैद करके अपने देश ले जाता है और वहां पृथ्वीराज चौहान को तरह तरह की यातना दी जाती है । गर्म सलाखों से उनकी आँखे फोड़ दी जाती है । अपनी इस बेइज्जती का बदला लेने के लिए चन्द्रबरदाई और पृथ्वीराज चौहान मिलकर सुल्तान को मारने का निश्चय करते हैं । चन्द्रबरदाई द्वारा सुल्तान मोहम्मद गोरी तक यह बात पहुंचायी गयी कि पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण चलाने में निपुण है । सुल्तान ने पृथ्वीराज चौहान की इस योग्यता को देखने के लिए एक सभा आयोजित किया । जिसमें पृथ्वीराज चौहान ने अपने मित्र चन्द्रबरदाई के शब्दों के इशारे पर सुल्तान पर शब्द भेदी बाण छोड़ा और उसकी मृत्यु हो गई।  इसके बाद पृथ्वीराज चौहान और चन्द्रबरदाई ने खुद एक दूसरे को मार डाला । उधर जब यह बात संयोगिता तक पहुंची तो उसने भी जौहर कर लिया और सती हो गई । 

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