वेताल पच्चीसी - प्रारंभ की कहानी | विक्रम वेताल की कहानी

 

Vikram Betal photo
Vikram Betal in hindi


वेताल पच्चीसी - प्रारंभ की कहानी | विक्रम - वेताल की कहानियाँ हिन्दी में 


वेताल पच्चीसी परिचय | Betal Pachisi Introduction


वेताल पच्चीसी पच्चीस कथाओं से युक्त एक ग्रंथ है । इसके रचयिता बेतालभट्ट राजा विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक थे । ये कथाएं राजा विक्रमादित्य के न्याय-शक्ति का बोध कराती है । वेताल हर बार राजा विक्रमादित्य से ऐसा प्रश्न करता कि उसे जवाब देना पड़ता था । उसकी यह शर्त थी कि जब राजा बोलेगा वह फिर से पेड़ पर जा लटकेगा । लेकिन यह जानते हुए भी राजा विक्रमादित्य से चुप न रहा जाता । 



वेताल पच्चीसी आरंभ | Betal Pachisi stories


बहुत पुरानी बात है , धारा नगरी में गंधर्वसेन नामक राजा राज्य करता था । उसके चार रानियां थी । उनके छः पुत्र थे ।  जब राजा गंधर्वसेन की मृत्यु हो गई तो उसका सबसे बड़ा पुत्र शंख गद्दी पर बैठा । उसने कुछ दिन राज किया , लेकिन उसके छोटे भाई विक्रमादित्य ने उसकी हत्या कर दी और खुद गद्दी पर बैठा । उसका राज्य दिनोंदिन बढ़ता ही चला गया । एक दिन उसके मन में आया कि उसे घूमकर सैर करनी चाहिए । जिन देशों के नाम उसने सुन रखे हैं , उन्हें देखना चाहिए । सो वह गद्दी अपने छोटे भाई भर्तृहरि को सौंपकर तीर्थ यात्रा पर निकल पड़ा । उस नगर में एक ब्राह्मण तपस्या करता था । एक दिन देवता ने प्रसन्न होकर उसे एक फल दिया और कहा कि जो भी इसे खाएगा वह अमर हो जाएगा ।  ब्राह्मण ने वह फल लाकर अपनी पत्नी को दिया और देवता की बात भी बताई।  


ब्राह्मणी बोली - हम अमर होकर क्या करेंगे , हमेशा भीख मांगते रहेंगे । इससे तो मरना ही अच्छा है । तुम इस फल को ले जाकर राजा को दे दो और कुछ धन लेकर आ जाओं । 

यह सुनकर ब्राह्मण राजा भर्तृहरि के पास गया और सारा हाल कह सुनाया । भर्तृहरि ने फल लेकर ब्राह्मण को लाख रूपये देकर विदा किया । राजा अपनी एक रानी को बहुत चाहता था उसने वह फल उसी को दे दिया । रानी की दोस्ती एक कोतवाल से थी उसने वह फल उसे दे दिया । कोतवाल एक वेश्या के पास जाया करता था , उसने वह फल उसे दे दिया । वेश्या ने सोचा कि यह फल तो राजा को खाना चाहिए । वह उसे लेकर राजा भर्तृहरि के पास गई और उसे दे दिया । भर्तृहरि ने उसे बहुत सा धन दिया और फल ले लिया । राजा ने जब उस फल को अच्छी तरह से देखा तो वह वही फल था जो उसे ब्राह्मण ने दिया था । उसे बड़ी चोट लगी , पर उसने किसी से कुछ न कहा । उसने महल में जाकर रानी से पूछा कि तुमने वह फल क्या किया । रानी ने कहा कि मैंने वह फल खा लिया । राजा ने वह फल रानी को दिखाया , रानी घबरा गई और सारी बात राजा को सच-सच बता दी । भर्तृहरि ने पता कराया तो सारी बात सच निकली । वह बहुत दुखी हुआ और सोचा यह दुनिया एक मोह-माया जाल है । इसमें कोई अपना नहीं है । वह फल लेकर बाहर आया और फल धोकर खुद खा लिया । फिर राज-पाट छोड़ योगी का रूप धारण कर जंगल की ओर चल पड़ा । भर्तृहरि के जंगल चले जाने से विक्रमादित्य की गद्दी खाली हो गई । जब इन्द्र को यह बात पता चली तो उसने एक देव को धारा नगरी की रक्षा के लिए भेज दिया । वह हरदम वही रहने लगा । 


भर्तृहरि के राज-पाट छोड़कर चले जाने की बात जब विक्रमादित्य को पता चली तो वह अपनी नगरी वापस लौट आया । आधी रात का समय था । जब वह नगर में प्रवेश करने लगा तो देव ने उसे रोका । 

राजा ने कहा - मैं विक्रमादित्य हूँ और यह मेरा राज्य है । 


देव बोला - मुझे इन्द्र ने इस नगर की रक्षा करने के लिए भेजा है । तुम अगर सच में राजा विक्रम हो तो मुझसे युद्ध करो । देव और राजा विक्रमादित्य के बीच लड़ाई हुई और थोड़ी देर में ही विक्रम ने उसे हरा दिया । 


देव ने कहा कि राजन् तुमने मुझे हरा दिया मैं तुम्हें जीवन दान देता हूँ । इसके बाद देव ने कहा - राजन् , एक नगर और एक नक्षत्र में तुम तीन आदमी पैदा हुए । तुमने राजा के घर जन्म लिया , दूसरे ने तेली और तीसरे ने कुम्हार के घर जन्म लिया । तुम यहाँ के राजा हो तेली पाताल में राज करता है । कुम्हार ने योग साधकर तेली को मारकर शमशान में पिशाच बना सिरस के पेड़ से लटका दिया है । अब वह तुम्हें मारने की फिराक में है । उससे सावधान रहना । इतना कहकर देव चला गया और राजा महल में चला गया । राजा के वापस आने से सभी बड़े खुश हुए और राजा फिर से राज करने लगा।  


एक दिन की बात है , शान्तिशील नामक एक योगी राजा विक्रमादित्य के दरबार में आया और उसे एक फल देकर चला गया । राजा को शक हुआ कि कहीं वह वहीं आदमी तो नहीं जिसके बारे में देव ने उसे बताया था । यह सोच उसने फल नहीं खाया और फल भंडारी को दे दिया । योगी आता और रोज उसे एक फल देकर चला जाता । संयोग से राजा एक दिन अपना अस्तबल देखने गया । योगी वहां पहुंचा और राजा के हाथ में एक फल दे दिया । राजा ने उसे हवा में उछाला तो वह धरती पर गिर पड़ा।  उसी समय एक बंदर ने झपटकर उसे ले लिया और तोड़ दिया । उसमें से एक लाल निकला , जिसकी चमक से सबकी आँखे चौंधिया गई । राजा को बड़ा अचरज हुआ । 


उसने योगी से पूछा - आप यह लाल मुझे क्यों रोज दे जाते हो ?


योगी ने कहा - महाराज ! राजा , गुरु , ज्योतिषी , वैद्य और बेटी इनके घर कभी खाली हाथ नहीं जाना चाहिए । 


राजा ने भंडारी को बुलाया और पहले के दिए सभी फल मंगवाए । तोड़ कर देखा तो सभी से एक लाल निकला । इतने लाल देखकर राजा को बड़ा हर्ष हुआ।  उसने जौहरी को बुलाकर उनका मूल्य पूछा । जौहरी ने कहा - महाराज ऐ लाल करोडों रुपये के है । एक लाल का मूल्य एक राज्य के बराबर है । 


यह सुनकर वह योगी को अकेले में ले गया । 

वहां जाकर योगी ने कहा - महाराज , गोदावरी नदी के किनारे मसान में मैं एक मंत्र सिद्ध कर रहा हूँ । उसके सिद्ध होने पर मेरा मनोरथ पूरा हो जाएगा । तुम एक रात मेरे साथ रहोगे तो मेरा मंत्र सिद्ध हो जाएगा । एक दिन रात को हथियार बांधकर अकेले तुम मेरे पास आना । 


राजा ने कहा कि अच्छी बात है । 


इसके बाद योगी ने समय और दिन बताकर अपने मठ में चला  गया । वह दिन आने पर राजा वहां पहुंचा । योगी ने उसे अपने पास बिठाया । 

थोड़ी देर बाद राजा ने पूछा - महाराज मेरे लिए क्या आज्ञा है ?

योगी ने कहा - यहां से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर मसान में सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा लटका है । उसे मेरे पास ले आओं । तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ । 

यह सुनकर राजा वहां से चल दिया । बड़ी भयंकर रात थी । चारों ओर घना अंधेरा था । पानी बरस रहा था । भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे । सांप आकर पैरों में लिपटते थे । परंतु राजा हिम्मत से आगे बढ़ता जा रहा था । जब वह मसान पहुंचा तो देखता है कि शेर दहाड़ रहे हैं , हाथी चिघाड रहे है , भूत-प्रेत आदमीयो को मार रहे हैं । राजा बेधड़क सिरस के पेड़ के पास पहुंचा । पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था । राजा ने सोचा हो न हो यह वही योगी है जिसके बारे में देव ने उसे बताया था । पेड़ पर रस्सी से बंधा मुर्दा लटक रहा था ।  राजा पेड़ पर चढ़ गया और उसने तलवार से रस्सी काट दिया । मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार कर रोने लगा । 


राजा ने नीचे आकर पूछा - तू कौन है ?

राजा का इतना कहना था कि मुर्दा खिलखिलाकर हंसने लगा । राजा को बड़ा अचरज हुआ ।  तभी वह मुर्दा फिर से जा पेड़ पर लटक गया।  राजा फिर ऊपर गया और रस्सी काट , मुर्दे को बगल में दबा नीचे उतरा । 

राजा बोला - बता तू कौन है ?

मुर्दा चुप रहा।  

तब राजा ने उसे एक चादर में बांधा और योगी के पास ले चला । 

रास्ते में वह मुर्दा बोला - मैं वेताल हूँ और तू कौन है ? और मुझे कहां ले जा रहा है ?

राजा ने कहा - मैं विक्रम हूँ और धारा नगरी का राजा हूँ । मैं तुम्हें योगी के पास ले जा रहा हूँ । 

वेताल बोला - एक शर्त पर चलूंगा । अगर तू रास्ते में बोला तो जाकर उस पेड़ पर लटक जाऊंगा।

राजा ने उसकी बात मान ली।  

वेताल बोला -  पण्डित , ज्ञानी और चतुर के दिन अच्छी अच्छी बातें में बीतते है जबकि मूर्ख के दिन कलह और नींद में बीतते है।  अच्छा होगा कि हमारी राह अच्छी बातें सुनने में बीते । मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं । ले सुन ..



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