राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ 8 / Stories of Raja Vikramaditya 8

 सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ 

Vikramaditya photo


आठवीं पुतली पुष्पावती ने कहना आरंभ किया - 

एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक बढ़ई आया।  उसने राजा को एक काठ का घोड़ा दिखाया और कहा कि यह न कुछ खाता है , न पीता है , और जहाँ चाहो वहां ले जाता है । राजा ने उसी समय दीवान को बुलाकर कहा कि इसे एक लाख रुपये दे दो ।  यह तो काठ का है और इतने दाम का नहीं है ।


राजा ने चिढ़कर कहा - दो लाख दे दो । दीवान ने चुपचाप रूपये दे दिए । रूपये लेकर बढ़ई चलता बना परंतु जाते हुए कह गया कि इस घोड़े पर ऐड़ लगाना कोडा मत मारना । 



एक दिन राजा विक्रमादित्य ने उस पर सवारी की पर वह बढ़ई की बात भुल गया और घोड़े पर कोडा जमा दिया । कोड़ा लगते ही घोड़ा हवा से बातें करने लगा और समुद्र को पार कर एक जंगल में जा एक पेड़ पर पटक दिया । लुढ़कता हुआ राजा पेड़ से नीचे गिरा और मुर्दा जैसा हो गया । संभलने पर उठा और चलते-चलते एक ऐसे बीहड़ वन में पहुंचा जहां से निकलना मुश्किल हो गया।  जैसे तैसे वह वहां से निकला और दस दिन में सात कोस चलकर एक ऐसे बीहड़ वन में जा पहुंचा जहां हाथ तक नहीं सूझता था । चारों ओर शेर और चीते की दहाडने की आवाज आ रही थी । राजा घबरा गया परंतु उसे कोई रास्ता न सूझ रहा था । आखिर पंद्रह दिन भटकने के बाद वह एक ऐसी जगह पहुँचा जहां एक मकान दिखाई दिया । उसके बाहर एक ऊंचा पेड़ और दो कुएं थे।  पेड़ पर एक बंदरिया रहती थी । वह कभी नीचे आती कभी ऊपर चढ़ती थी।  



राजा पेड़ पर चढ़ गया और छिप कर सब हाल देखने लगा।  दोपहर होने पर एक यती वहां आया । उसने अपनी बाईं ओर के कुएं में से एक चुल्लु पानी लिया और उस बंदरिया पर छिडक दिया । वह तुरंत ही एक बहुत सुंदर स्त्री बन गई । यती पहरभर उसके साथ रहा  , फिर दूसरे कुएं से पानी खींचकर उस पर डाला कि वह फिर से बंदरिया बन गई । वह पेड़ पर चढ़ी और यती गुफा में चला गया ।  


राजा को यह देख बड़ा अचम्भा हुआ । यती के जाने के बाद उसने भी ऐसा ही किया । पानी पड़ते ही बंदरिया सुंदर स्त्री बन गई । राजा ने जब प्रेम से उसकी ओर देखा तो उसने कहा - "हमारी तरफ ऐसे मत देखो हम तपस्वी है । शाप दे देंगे तो भस्म हो जाओगे ।"

राजा बोला - मेरा नाम विक्रमादित्य है । मेरा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता है ।

राजा का नाम सुनते ही वह उसके चरणों में गिर पड़ी और कहा - महाराज ! तुम अभी यहां से चले जाओ , नहीं तो यती आएगा और हम दोनों को श्राप देकर भस्म कर देगा । 

राजा ने पूछा - तुम कौन हो और इस यती के हाथ कैसे पड़ी ?

वह बोली - मेरा पिता कामदेव और माता पुष्पावती है । जब मैं बारह बरस की हुई तो मेरे माता-पिता ने एक काम करने के लिए कहा । मैने उसे नहीं किया तो गुस्से में उन्होंने मुझे इस यती को दे दिया । वह मुझे यहां ले आया और बंदरिया बनाकर रखा है । सच है भाग्य का लिखा कोई बदल नहीं सकता । 


राजा ने कहा - मैं तुम्हें साथ ले चलूंगा और दूसरे कुएं का पानी छिड़क उसे फिर से बंदरिया बना दिया।  

अगले दिन वह यती आया । उसने बंदरिया को स्त्री बनाया तो उसने कहा - मुझे कुछ प्रसाद दो । 

यती ने एक कमल का फूल दिया और कहा - यह कभी कुम्हलायेगा नहीं और रोज एक लाल देगा । इसे संभालकर रखना । 

यती के जाने के बाद राजा ने बंदरिया को स्त्री बनाया और अपने दोनों वीरों को बुलाया । वे आए और दोनों को तख़्त पर बिठाकर ले चले । जब वे अपने नगर के पास आए तो देखते है कि बड़ा ही सुंदर लड़का खेल रहा है । वह अपने घर चला गया और राजा स्त्री को साथ लेकर अपने महल चले गए ।


अगले दिन कमल में एक लाल निकला । इस तरह रोज एक लाल निकलने से कई लाल इकट्ठे हो गए । एक दिन उस लडके का बाप उन्हें बेचने बाज़ार गया जहां कोतवाल ने उसे पकड़ लिया और राजा के पास ले आया। उसने राजा को सारा हाल कह सुनाया । सुनकर राजा को कोतवाल पर बहुत गुस्सा आया उसने तुरंत उस बेकसूर आदमी को एक लाख रुपये देने का हुक्म दिया । 


इतना कहकर पुतली बोली - हे राजन् ! अगर आप विक्रमादित्य जैसे दानी और न्यायी हो तो इस सिंहासन पर बैठो । 


राजा भोज झुंझलाकर चुप हो गए और अगले दिन सिंहासन में बैठने का पक्का निश्चय किया । अगले दिन फिर से उन्हें नौवीं पुतली मधुमालती ने रोक दिया । 


वह बोली - राजन् पहले मेरी बात सुनों । 

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