राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ 26 / Stories of Raja Vikramaditya
सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ
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Raja Vikramaditya stories in hindi |
छब्बीसवीं पुतली मृगनयनी ने कहना आरंभ किया -
एक दिन राजा विक्रमादित्य के मन में विचार आया कि वह राजकाज की माया में ऐसा भूला है कि उससे धर्म-कर्म नहीं हो पाता । यह सोचकर वह तपस्या करने जंगल चला गया । वहां बहुत से तपस्वी आसन मारे धूनी के सामने बैठे साधना कर रहे हैं और धीरे-धीरे अपने शरीर को काट-काट कर होम कर रहें है । राजा ने भी ऐसा ही किया । तब एक दिन शिव का एक गण आया और सभी तपस्वियों की राख समेटकर उसमें अमृत छिड़क दिया । सारे तपस्वी जीवित हो उठे परंतु संयोग से राजा की राख की ढेरी पर अमृत छिड़कने से रह गया । तपस्वियों ने यह देखकर शिव जी से प्रार्थना कि की उसे जीवित कर दे । शिव जी ने राजा को जीवित कर दिया ।
शिव जी ने प्रसन्न होकर कहा - तुम्हारी जो इच्छा है सो मांगो ।
राजा ने कहा - आपने मुझे जीवन दिया है तो इस दुनिया से मेरा उद्धार कीजिए।
शिव जी ने हंसकर कहा - तुम्हारे समान कोई कलियुग में ज्ञानी , योगी और दानी न होगा ।
इतना कहकर शिव जी ने राजा विक्रमादित्य को एक कमल का फूल दिया और कहा " जब यह मुरझाने लगे तो समझना कि छः महीने के भीतर तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी । "
फूल लेकर राजा विक्रमादित्य अपने नगर को लौटा और कई बर्षों तक अच्छी तरह रहा । एक बार उसने देखा कि फूल मुरझा गया है तब उसने अपनी सारी धन-दौलत दान कर दिया ।
पुतली बोली - हे राजन् अगर ऐसे हो तो सिंहासन पर बैठों ।
वह दिन भी निकल गया । राजा भोज सिंहासन पर न बैठ सका। अगले दिन सत्ताईसवीं पुतली ने रोककर कहानी सुनाई ।
सत्ताईसवीं पुतली की कहानी अगले पोस्ट में पढें -
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