राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ 19 / Stories of Raja Vikramaditya 19

 सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ



उन्नीसवीं पुतली रूपरेखा ने कहना शुरू किया - 

एक ब्राह्मण हाथ पैर की लकीरों को अच्छे से जानता था । एक दिन उसने रास्ते में एक पैर के निशान देखे , जिसमें ऊपर को जाने वाली लकीर थी और कमल का फूल था । ब्राह्मण ने सोचा हो न हो कोई राजा इधर से अभी गुजरा है । यह सोचकर वह उन निशानों को देखता हुआ उधर चल दिया । कोसभर गया होगा कि उसे एक आदमी दिखाई दिया जो पेड़ से लकड़ियों का गट्ठर बांध रहा था । 

उसने पूछा - तुम कबसे यहां हो ? इधर कोई आया है क्या ?

उसने जवाब दिया - मैं तो दो घड़ी रात से यहां हूँ।  आदमी तो दूर मुझे तो एक परिंदा भी नहीं नजर आया।  

इस पर ब्राह्मण ने उसका पैर देखा रेखा और कमल दोनों मौजूद थे । ब्राह्मण सोच में पड़ गया कि आखिर मामला क्या है ? सब लक्षण राजा के होते हुए भी इसकी यह हालत है । ब्राह्मण ने उस आदमी से पूछा - तुम यहाँ कब से रहते हो और कब से यह काम कर रहे हो ?

उसने बताया - मैं राजा विक्रमादित्य के नगर में रहता हूँ और जब से होश संभाला है तब से यही काम कर रहा हूँ ।

ब्राह्मण ने पूछा - क्यों तुमने बहुत दुख पाया है ?

आदमी बोला - भगवान की इच्छा है किसी को हाथी पर चढ़ाए किसी को पैदल फिराए । किसी को धन दौलत बिना मांगे मिले किसी को मांगने पर भी एक टुकड़ा न मिले । जो किस्मत में लिखा है वह भुगतना ही पड़ेगा । 

                              ब्राह्मण सोचने लगा कि मैंने इतनी मेहनत से यह विद्या पढ़ी सो झूठी निकली । अब राजा विक्रमादित्य के पास जाकर उसके भी निशान देखूं । न मिले तो पोथियों को जला दूंगा । इतना सोचकर वह राजा विक्रमादित्य के पास गया और राजा के पैर देखे । कोई निशान न था।  उसे बहुत दुख हुआ उसने निर्णय लिया कि घर जाकर सभी पोथियों को जला दूंगा। 
उसे उदास देखकर राजा ने पूछा ।  ब्राह्मण ने सारी बात बताई । बोला - जिसके पैर में राजा बनने के निशान है वह जंगल में लकड़ी काटता है और जिसके निशान नहीं है वह राज करता हैं । 

राजा बोला - किसी के लक्षण दिखाई देते है किसी के गुप्त होते हैं।  

ब्राह्मण बोला - मैं कैसे जानू ?

राजा ने छुरी मारकर तलवे की खाल चीरकर लक्षण दिखा दिया।  ब्राह्मण से बोला - हे ब्राह्मण ऐसी विद्या किस काम की , जिसे सब भेद मालूम न हो । 

ब्राह्मण लज्जित हो अपने घर चला गया।  


पुतली बोली - जो इतना साहस रखता हो , वह सिंहासन पर बैठे । नाम , धर्म और यश आदमी के जाने से नहीं जाता । यह सुनकर राजा भोज के चेतना हुआ । कहने लगा - यह दुनिया स्थिर नहीं है । जिस तरह सूरज चाँद आते जाते है उसी प्रकार मनुष्य का भी जीना-मरना है।  देह दुख देती हैं । हरि भजन में सुख है । 

राजा ने यह सब सोचा लेकिन जैसे ही अगला दिन हुआ उसे फिर सिंहासन पर बैठने की इच्छा हुई । तब बीसवीं पुतली ने उसे रोक दिया और अपनी कहानी सुनाने लगी ।



बीसवीं पुतली की कहानी अगले पोस्ट में पढें -

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