राजा विक्रमादित्य की कहानियाँ 11 / Stories of Raja Vikramaditya 11

 सिंहासन बत्तीसी की कहानियाँ


राजा विक्रमादित्य का चित्र

ग्यारहवीं पुतली त्रिलोचना ने अपनी कहानी सुनाई-

एक रात राजा विक्रमादित्य सो रहा था । रात का समय था।  अचानक उत्तर दिशा से किसी के रोने की आवाज आई । राजा ढाल-तलवार लेकर रात के अंधकार में ही आवाज़ की ओर निकल पड़ा । जंगल में जाकर देखा तो एक स्त्री दहाड़े मारकर रो रही है और एक देव उसे हैरान कर रहा है।  राजा को क्रोध आ गया । दोनों में लड़ाई ठन गई। राजा ने ऐसे तलवार से मारी की देव का सिर धड़ से अलग हो गया । देव के सिर और धड़ से दो वीर निकले । वे राजा से युद्ध करने लगे।  उनमें से एक को तो राजा ने मार डाला परंतु दूसरा बचके भाग निकला। 

राजा ने उस स्त्री से अपने साथ चलने को कहा ।

स्त्री बोली - हे राजन् ! मैं कहीं भी जाऊँ उस राक्षस से बच नहीं सकती । उसके पेट में एक मोहिनी हैं , जिसमें ऐसी ताकत है कि वह एक देव के मरने पर चार देव बना सकती है ।

यह सुनकर राजा विक्रमादित्य वही छिप गया और देखने लगा कि आगे क्या होता है । शाम होते ही वह देव फिर आकर उस स्त्री को हैरान करने लगा । राजा से यह सब देखा न गया । वह निकलकर आया और देव से लड़ने लगा।  लड़ते-लड़ते उसने ऐसा खांडा मारा कि देव का सिर कट गया । धड़ से मोहिनी निकली और अमृत लेने चली । राजा विक्रमादित्य ने उसी समय अपने दोनों वीरों को बुलाया । उसने कहा कि देखो वह स्त्री मोहिनी जाने न पाए । वीर उसे पकड़कर लाएं ।




राजा विक्रमादित्य ने पूछा - तुम कौन हो ? हंसती हो तो फूल झड़ते है । देव के पेट में आखिर क्यों रहती हो ?


वह बोली - मैं पहले शिव की गण थी।  एक बार उनकी आज्ञा का उल्लंघन किया तो उन्होंने शाप देकर मोहिनी बना दिया और इस देव को दे दिया । तब से यह मुझे अपने पेट में डाले रखता है । हे राजन् ! अब मैं तुम्हारे बस में हूँ और तुम्हारे साथ रहूंगी जैसे शिव के साथ पार्वती रहती है । 


राजा विक्रमादित्य मोहिनी और उस स्त्री को साथ ले अपने महल आ गया । उसने मोहिनी से विवाह कर लिया । दूसरी स्त्री से जब उसने उसके बारे में पूछा तो उसने बताया कि वह सिंहलद्वीप के एक ब्राह्मण की कन्या है । एक दिन अपनी सखियों के साथ तालाब में स्नान करने गई । नहा-धोकर पूजा-पाठ करके जब लौटने लगी तो वह राक्षस सामने आ गया । इसने मुझे बहुत सताया । राजन् तुमने मुझे उससे बचा कर जो उपकार किया है वह मैं कभी नहीं भूलूगी । तुम हजार बर्ष तक जिओगे और नाम कमाओगे।  


इसके बाद राजा विक्रमादित्य ने उस ब्राह्मण कन्या के लिए एक योग्य ब्राह्मण वर ढूंढा और उसका कन्यादान स्वयं किया । लाखों रूपये दान में दिए।  


कहानी सुनाकर ग्यारहवीं पुतली बोली - हे राजन् ! अगर तुम ऐसे हो तो ही इस सिंहासन पर बैठना।  


राजा भोज मन मसोसकर रह गया । उसने निर्णय लिया कि अगले दिन किसी की नहीं सुनेगा । फिर से अगले दिन उसे बारहवीं पुतली ने रोक दिया और अपनी कहानी सुनाई ।




बारहवीं पुतली की कहानी अगले पोस्ट में पढें -

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