जो गरजते है वे बरसते नहीं


         
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कुंभज नाम का एक कुम्हार बहुत सुन्दर घड़े , सुराही और

गमले बनाता था । उसके बनाये सामान की मांग दूर-दूर के

गावों तक थी । वह अपनी काम बहुत ईमानदारी और निष्ठा के

साथ करता था । उसके पास रहने के लिए बस एक ही कमरा

था और बाहर बहुत बड़ा चौक था ।  कुंभज अपने बनाये मिट्टी

के बरतनों को चौक पर ही सुखाया करता था ।  वह दिन-रात

परिश्रम करके अपने काम  करके भी अपने जीवन से बहुत

खुश था ।



कुंभज अभी अविवाहित था और चाहता था कि मेहनत करके

थोड़ा पैसा कमा लूं फिर विवाह करूंगा । वह बहुत ही

होशियार था । किसी काम को गहराई से समझता तभी उसमें

हाथ डालता ।


                    कुंभज के बनाये बर्तन हमेशा चौक पर ही रहते

इसलिए उसे बरसात के दिनों या फिर बेमौसम बरसात में

काफी दिक्क़त का सामना करना पड़ता था ।

एक दिन की बात है , अचानक मौसम बहुत खराब हो गया

तेज हवाएं चलने लगी बादल गरजने लगे । वैसे तो उसने

बरसात से अपने बर्तनों को बचाने का इंतजाम कर रखा था

पर फिर भी अचानक बादलों के कड़कने की आवाज़ सुनकर

उसे ऐसा लगा कि आज मुसलाधार बारिश होगी और उसके

सारे बर्तन भींग जाऐंगे । उसने जल्दी ही चौक के चारों ओर

कील ठोककर तिरपाल डाल  दिया । लेकिन इतने में ही उसने

देखा कि जो बादल गरज-गरज कर उसे डरा रहे थे उसमें पानी

की एक बूंद नहीं थी । पल भर में पूरा आसमान साफ हो गया

मौसम का ऐसा मिजाज देखकर कुंभज मुस्कुरा उठा और

अपने काम में लग गया ।


                             एक बार कि बात है, कुंभज का दूर का

एक भाई आया । दोनों बातें करते हुए बर्तन बना रहे थे तभी

एकाएक बहुत तेज हवा चलने लगी और बादल गरजने लगे ।

कुंभज के भाई ने कहा - "भईया लगता है कि बहुत तेज

बारिश होने वाली है ।"

कुंभज ने अपने भाई से कहा कि 'अरे नहीं भाई जो गरजते 

है वे बरसते नहीं । "

थोड़ी देर मे आसमान साफ हो गया । उसके भाई ने कहा कि -

तुम सही कहते हो भईया "जो गरजते है वे बरसते नहीं"।





                          उसी समय से यह कहावत प्रचलित हो

गई  जो गरजते है वे बरसते नहीं ।





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