बिना प्रयोजन के कार्य

मगध देश में धर्मवन के निकट शुभदत्त नाम के एक कायस्थ ने एक विहार बनवाना आरंभ किया।

विहार के आसपास बढ़ई द्वारा चीरी गई इमारत बनाने की लकड़ियां पड़ी हुई थी।

उन्हीं में से एक लकड़ी को बीच से थोड़ा चीरकर उसे अलग-अलग करने की इच्छा से एक बढ़ई ने उसमें एक कील लगा दी थी।

मध्यान्ह के समय जब सारे श्रमिक भोजन करने के लिए गए हुए थे तो वानरों का एक विशाल समूह वहां आ पहुंचा।



इस समूह का एक बंदर कुछ ज्यादा ही चंचल था।

वह चीरी हुई लकड़ी के ऊपर बैठ गया।इस प्रकार उसके अंडकोश लकड़ी के चीरे हुए भाग में नीचे लटक गए।

उस शरारती बंदर ने उस कील को उखाड़ना आरंभ कर दिया। थोड़ा प्रयत्न करने पर कील तो उखड़कर उसके हाथ में आ गई किन्तु चीरी हुई लकड़ी के दोनों भाग पुनः मिल जाने से उसके अंडकोश उसमें फंस गए।

लाख प्रयत्न करने पर भी उसके अंडकोश बाहर नहीं निकल सके और बंदर ने छटपटाकर वहीं दम तोड़ दिया।



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